जैन-धर्म
Jain Religion
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मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ससंघ बाडम बाज़ार जैन मंदिर हजारीबाग में विराजमान हैं ।
झारखंड प्रान्त के हजारीबाग शहर में जन्मे मुनि श्री प्रमाणसागर जी, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रमुख शिष्यों में से हैं। अल्पवय में ही अंतर्यात्रा की ओर उन्मुख होने वाले मुनिश्री साधना, संयम और सृजन के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपका चिन्तन और अभिव्यक्ति कौशल हजारों - हजारों श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर भाव-विभोर कर देता है। धारा प्रवाह प्रवचन में शब्द-सौष्ठव एवं प्रस्तुतिकरण की मोहकता, मधुबन में बांसुरी की भांति प्रभावी है। आप हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत एवं अंग्रेजी के अधिकारी विद्वान के रूप में बहु-आदरित हैं। अध्ययनप्रियता, आपका पथ व संयम, आपकी शैली एवं साधना आपकी गुणधर्मिता है। आप आगम के गूढ़तम ज्ञाता, जिणवाणी के प्रखर प्रस्तोता हैं। आपकी बहु प्रशंसित कृति "जैन धर्म और दर्शन" विचार, अध्यात्म एवं चिन्तन - जगत में अनुठे अनुदान की भांति सर्वमान्य है। जैन आगम के गूढ़ तत्त्वों की सहज-सरल-सुबोध प्रस्तुति इस कृति का अनुपम वैशिष्ट्य है। "जैन तत्त्व विद्या" आपकी तत्त्वान्वेशी मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण है।
समाधान
पूज्य महाराजश्री द्वारा जिज्ञासुओं के प्रश्नों का आध्यात्मिक समाधान, क्लिक करें
हजारीबाग में हुआ
भव्य मंगल प्रवेश

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परमप्रभावक शिष्य निर्ग्रंथ गौरव परम पूज्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज एवं पूज्य मुनिश्री 108 विराटसागर जी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश धर्मनगरी हजारीबाग में अपूर्व उल्लास एवं उमंग के साथ हुआ। पूज्य मुनिश्री की जन्मस्थली होने से श्रद्धालुओं मुनिश्री की आगवानी के प्रति विशेष उत्साह था।हजारों स्त्री पुरुष अपने हाथों में केशरिया ध्वज लेकर कतारवद्ध होकर शोभायात्रा में चल रहे थे। जगह जगह मुनि संघ की आरती उतारी गई , पाद प्रक्षालन किया गया। मुनिश्री के साथ संघस्थ ब्र॰ शांतिलाल बाबा जी एवं ब्र॰ रोहित भैया जी भी शोभा यात्रा में शामिल थे। आसपास के जैन समाज के साथ स्थानीय जनता में भी विशेष उत्साह था ।

ज्ञातव्य हो कि हजारीबाग स्थित बाडम बाज़ार जैन मंदिर के नवनिर्माण का कार्य पूर्ण हो गया है। आचार्य गुरुवर की असीम कृपा एवं आशीर्वाद से इस भव्य जिनालय का पंच कल्याणक आगामी 25 मई से 31 मई 2013 तक भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ गजरथ के साथ सम्पन्न होगा। परम पूज्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विराट सागर जी संघ सहित इसी कार्यक्रम के निमित्त मधुबन शिखरजी से बिहार करके हजारीबाग स्थित बाडाम बाजार मंदिर जी में प्रवेश किये । प्रवेश के उपरांत मंदिरजी की शोभा देखकर महाराज श्री ने कहा कि यह मंदिर मेरी कल्पनाओं से भी सुंदर है। 9 वेदी, वर्तमान चौबीसी सहित तीन उत्तुंग शिखर युक्त यह मंदिर पूर्वाञ्चल का पहला मंदिर है। मुनिश्री ने श्रावकों को प्रेरित करते हुए कहा कि जितना सुंदर मंदिर बना है, पंचकल्याणक भी उतना ही भव्य होना चाहिए।

भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा

विश्व शांति महायज्ञ

एवं

गजरथ महोत्सव:

25 मई से 31 मई 2013

हजारीबाग (झारखंड)

हजारीबाग में होगा ऐतिहासिक पंचकल्याणक

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परमप्रभावक शिष्य निर्ग्रंथ गौरव परम पूज्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज की जन्मस्थली हजारीबाग में आगामी 25 मई से 31 मई 2013 तक भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ गजरथ के साथ सम्पन्न होगा । परम पूज्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विराट सागर जी महाराज के  पावन सानिध्य एवं ससंघ ब्र॰ शांतिलाल बाबा जी एवं ब्र॰ रोहित भैया जी की समुपस्तिथि तथा बा॰ ब्र॰ प्रदीप भैया जी के प्रतिष्ठाचार्यत्व में यह आयोजन होगा. इस आयोजन में आकर्षण का केंद्र होगा झारखण्ड का प्रथम गजरथ महोत्सव। जैन स्कूल हजारीबाग के ग्राउंड में भव्य पाण्डाल का निर्माण किया गया है । सकल दिगंबर जैन समाज ने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए कमर कस ली है।

ज्ञातव्य हो कि हजारीबाग स्थित बाडम बाज़ार जैन मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्य पूर्ण हो गया है। भव्य जिनालय 9 वेदी एवं चौबीसी सहित तीन उत्तुंग शिखर बन कर तैयार हो गए है। आचार्य गुरुवर की असीम कृपा एवं आशीर्वाद से इस भव्य जिनालय का पंच कल्याणक सानंद सम्पन्न होगा। देश के सभी त्यागी-व्रतियों - श्रेष्ठियों आदि को इस महामहोत्सव हेतू समाज ने आमंत्रित किया है।

दयोदय दिव्य घोष – टीकमगढ़, म्यूज़िकल ग्रुप टीकमगढ़, अशोकनगर, पथरिया, ललितपुर आदि स्थानो से भी दिव्य घोष अपनी स्वर लहरियाँ बिखेरेंगे इस महा महोत्सव में । ललितपुर सेवा दल के सदस्य इस पूरे आयोजन में आगंतुक अतिथियों की सेवा करेंगे। वही स्थानीय समाज के सभी वर्ग के सदस्य, महिला मण्डल, नवयुवक मण्डल आदि सभी एकजुट होकर इस आयोजन को सफल बनाने में जी जान से जुट गए हैं । परम पूज्य महाराज श्री का मंगल प्रवेश लगभग 10-11 मई को हजारीबाग में होना है । सभी समाज वाले चाहे जैन हो या अजैन पलक-पांवड़े बिछाकर पूज्य महाराज श्री की अगवानी हेतु उत्साहित हैं।

श्रीसिद्धचक्र महामण्डल विधान
20-27 मार्च 2013
गुणायतन परिसर
श्री सम्मेद शिखर जी
श्रीसिद्धचक्र महामण्डल विधान

संस्कार प्रणेता परम पूज्य 108 मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज एवं प. पू. मुनि श्री 108 विराट सागर जी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में गुणायतन परिसर, श्री सम्मेद शिखर जी में 20-27 मार्च 2013 तक श्रीसिद्धचक्र महामण्डल विधान का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ. विस्तृत समाचार के लिये क्लिक करें.

साहित्य सृजन
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मर्म जीवन का

जीवन की सार्थकता के लिए प्रथम सीढ़ी स्वरूप सम्यक्त मान्य है. मुनिश्री के गया प्रवास के अवसर पर सैद्धान्तिक एवं आध्यात्मिक विषय सम्यग्दर्शन के आठ अंगो के आधार पर दी गयी प्रेरणाओं को सन्कलित करती है प्रस्तुत कृति.......
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अंतस की आँखें

मुनि प्रमाणसागर की वाणी का ओज और अभिव्यक्ति की मधुरता का आकर्षण श्रोता समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किये बिना नहीं रहता। क्रान्त-दृष्टा पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी परम तपस्वी दिगम्बर जैनाचार्य १०८ श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का सान्निध्य पाकर पूरी तरूणाई में प्रखर साधु के रूप में जैन परम्परा में विद्यमान हैं। आपके प्रवचनों में मौलिकता और उपयोगिता है जो जन समुदाय को सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। प्रवचन की विषय वस्तु, शब्द, संयोजना, प्रस्तुति एवं प्रभावकर्त्ता ने कृति को विलक्षण बना दिया है। प्रस्तुत कृति में सम्यग्दर्शन के विभन्न अंगों की हद्य्स्पर्शी विवेचना पढ़कर एक मनुष्य पूर्ण मनुष्य कैसे बन सकता है, इसका सहज बोध होता है। मुनि श्री द्वारा जिस विलक्षणता के साथ तत्त्वों की विवेचना की गई है, वह प्राणों को मोहित करने में समर्थ है।
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धर्म साधिये जीवन में

जैन उपासना एवं साधना के मार्ग में निरन्तर विकास एवं स्थायित्व के लिए अनेक प्रकार की भावनाओं का विचार किया गया है । कभी व्रतों की सुरक्षा के लिए भावनाओं को भाने का परामर्श दिया, तो कभी व्यवहार की समीचीन प्रवृति के लिए भावनाओं का आश्रय लेने की बात कही । संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति - वैराग्य के लिए बारह भावनाओं का अबलम्बन लेने का निर्देश भी दिया गया । बारह भावनाओं का चिन्तवन किसी भी साधक के लिए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य होता है। आचार्यों की जनहितकारी वाणी में इन बारह भावनाओं की विस्तृत व्याख्याएँ - विवेचनाएँ प्रस्तुत हुई हैं । इन्हीं को सूत्र रूप से आश्रयीभूत करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी प्रखर शैली में प्रवचन देकर जनमानस को कृतार्थ किया है । प्रस्तुत कृति में बारह पाठों के माध्यम से जैनधर्म के अनेक गूढ़ सिद्धान्तों एवं रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।
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धर्म साधिये जीवन में

जैन उपासना एवं साधना के मार्ग में निरन्तर विकास एवं स्थायित्व के लिए अनेक प्रकार की भावनाओं का विचार किया गया है । कभी व्रतों की सुरक्षा के लिए भावनाओं को भाने का परामर्श दिया, तो कभी व्यवहार की समीचीन प्रवृति के लिए भावनाओं का आश्रय लेने की बात कही । संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति - वैराग्य के लिए बारह भावनाओं का अबलम्बन लेने का निर्देश भी दिया गया । आचार्यों की जनहितकारी वाणी में इन बारह भावनाओं की विस्तृत व्याख्याएँ - विवेचनाएँ प्रस्तुत हुई हैं । इन्हीं को सूत्र रूप से आश्रयीभूत करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी प्रखर शैली में प्रवचन देकर जनमानस को कृतार्थ किया है । प्रस्तुत कृति में बारह पाठों के माध्यम से जैनधर्म के अनेक गूढ़ सिद्धान्तों एवं रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।
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दिव्य जीवन का द्वार

संत कमल के फूल की भांति लोक-जीवन के वारिधि में रहता है, संतरण करता है, डुबकियाँ लगाता है किन्तु डुबता नही। यही इस सदी के प्रखर क्रान्तिचेता आचार्य श्री विद्यासागर जी का मंत्रघोष है। शंख-नाद और सिंह-नाद ! जिसे मुनि श्री ने साकार किया। मुनि श्री के प्रवचनों का यह संकलन इसी की अभिव्यक्ति है। मुनि श्री की व्यक्ति-चेतना की निजता ही इनका प्राण बिन्दु है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी के इन प्रवचनों में निजता के दर्शन होते है। शब्द-शब्द में उनकी क्रान्ति-चेतना का प्रतिबिंबन है, जो प्रवचन के कलेवर में श्रोता को संलग्न कर निरन्तर चैतन्य बनाये रहते हैं। तरूणाई की उर्जा और निष्ठा की प्रखरता, इतनी प्रभावी कि शब्द, अंतर को भेदते हुए हमारे मन को आंदोलित कर एक दिव्य चेतना दे देते है। आपाधापी की इस अंधी गति में जहां मनुष्य संवेदनशून्य बनकर निष्प्राण-सा भाग रहा है, चेतना के विध्वंस और संस्कृति के दमन की इस अभिशप्त बेला में अपनी अस्मिता के प्रति बेखबर है, ये प्रवचन उसे थमकर, बैठकर शांति से सोचेने-विचारने का आत्मबोध देते है, जो इन प्रवचनों की आत्मा और युग-बोध है।
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धर्म जीवन का आधार

शाश्वत सुख जीवन का लक्ष्य है । उसका स्त्रोत है मोक्ष । मोक्ष का मार्ग है आत्मस्वभाव रूप का अवलम्बन । आत्मस्वभाव के दशलक्षण है : उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्‍चन्य और बह्मचर्य। इनके मर्म का हद्‍यस्पर्शी उद्‍घाटन किया गया है , प्रस्तुत ग्रन्थ में , एक़ युवा प्रतिभाशाली बहु श्रुत और अनुभूतियों की गहराई में उतरे हुए दिगम्बर संत मुनि श्री प्रमाणसागर जी की अतिशयकारी लेखनी के द्वारा। धर्म जीवन का आधार एक ऐसी कृति है , जिसके अनुशीलन से धर्म के दशलक्षणों का स्वरूप सरलतया हद्‍यगम होगा और उनकी अभिव्यक्ति के लिए मन बैचन हो उठेगा।
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जैन धर्म और दर्शन

जैन धर्म और दर्शन के विशाल परिप्रेक्ष्य में ही इस ग्रंथ में, जैन इतिहास के कालक्रम का विश्व के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुतिकरण किया गया है। जिसे पढ़ कर मन एक ओर जिज्ञासामय समुद्र बन जाता है तो दूसरी ओर समाधान के रत्नों से संतुष्ट भी। जैन सिद्धांतो का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण इस कृति की अपनी मौलिक विशेषता है। जैन धर्म और दर्शन की जटिल पारिभाषिक शब्दावली में सामान्य पाठक तो क्या प्रबुद्ध वर्ग भी प्रायः उलझ जाता है, किन्तु मुनिश्री ने इस पुस्तक में गूढ़ से गूढ़ तत्वों को भी सरल तथा लोकभाषा में समझाया है। उन्होंने विश्व के विख्यात दार्शनिक, विज्ञानवेत्ताओं के मतों को मूल शब्दाबली में परिभाषित किया है।
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ज्योतिर्मय जीवन


जो शुभ है, वह जीवन को ज्योतिर्मय बनाता है, जबकि अशुभ से जीवन में अन्धकार छा जाता है। सारी अच्छाइयां ही जीवन का प्रकाश है । पूज्य मुनि श्री की यह पुस्तक अथ से इति तक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' स्वर्णिम सूत्र को पकड़कर ही आगे बढ़ी है। मानव जीवन को सुन्दर, सुपथगामी और सुखी बनाने की चेष्टा हैं- इन अमृतमयी प्रवचनों में। पूज्य मुनि श्री स्वयं में धर्म की गंगोत्री ही हैं । उनके चिन्तन और चलन में अभिन्नता है। जो उनके आचरण में है , वही उनकी जिव्हा पर आता है और इसीलिए हमारे चित्त पर अद्‍भुत प्रभाव छोड़ता है। उनके इन प्रवचनों में मर्त्य मानव को अमरता के संस्कार उपलब्ध हो सकते है।
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जैन तत्त्वविद्या

जैन धर्म की एनसाइक्लोपीडिया जैन तत्व विद्या में प्रज्ञा श्रमण निर्ग्रंथ गौरव मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने अपने ज्ञान गाम्भीर्य से जैन धर्म की विशिष्टताओं, तीर्थंकर का जीवन, पंचकल्याणक, अनेक साधना सूत्रों एवं दिव्य देशना से निसृत कर्म सिद्धान्त, त्रिरत्न, श्रमण धर्म, श्रावक धर्म, द्रव्य, तत्व एवं पदार्थ के साथ तीनों लोकों की संरचना को वर्तमान युग की वैज्ञानिक आधुनिक भाषा में परिभाषित किया है तथा जैन इतिहास एवं सिद्धान्तों का विश्व के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुतिकरण किया है। भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली से प्रकाशित यह कृति पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।
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कर्म जीवन का
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लक्ष्य जीवन का
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पाठ पढ़े नव जीवन का

छोटे-छोटे व्यसन धीरे-धीरे बहुत बड़ा रूप धारण कर लेतें हैं । प्रस्तुत पुस्तक में पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मुखार्विन्द से प्रवाहित प्रखर वाणी का संकलन है। मुनि श्री द्वारा जबलपुर महानगर में दस-दिवसीय-प्रवचनमाला में विभिन्न विषयों पर मंगल प्रवचन रूपी अमृतवर्षा हुई। जीवन की सार्थकता, दुखमुक्ति के उपाय, सुख का मूल संतोष, मन चंगा तो कठोती में गंगा, प्रसन्नता का राजमार्ग, धर्म और जीवन व्यवहार, घर-परिवार में नारी, सम्बन्ध पिता-पुत्र के, विलुप्त होते संस्कार और जीवन-मूल्य, धर्म और युवा आदि विषयों पर मुनि श्री की प्रवचन शैली श्रोताओं को सोचने पर विवश कर देती है।
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पाठ पढ़े नव जीवन का

छोटे-छोटे व्यसन धीरे-धीरे बहुत बड़ा रूप धारण कर लेतें हैं । प्रस्तुत पुस्तक में पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मुखार्विन्द से प्रवाहित प्रखर वाणी का संकलन है। मुनि श्री द्वारा जबलपुर महानगर में दस-दिवसीय-प्रवचनमाला में विभिन्न विषयों पर मंगल प्रवचन रूपी अमृतवर्षा हुई। जीवन की सार्थकता, दुखमुक्ति के उपाय, सुख का मूल संतोष, मन चंगा तो कठोती में गंगा, प्रसन्नता का राजमार्ग, धर्म और जीवन व्यवहार, घर-परिवार में नारी, सम्बन्ध पिता-पुत्र के, विलुप्त होते संस्कार और जीवन-मूल्य, धर्म और युवा आदि विषयों पर मुनि श्री की प्रवचन शैली श्रोताओं को सोचने पर विवश कर देती है।
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तीर्थंकर

बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुनिश्री अपनी कठोर चर्या का दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए निरन्तर ज्ञान, ध्यान में लीन रहते है । अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी मुनि श्री एक ओर जहां अपने प्रभावक प्रवचनों से जनमानस में सांस्कृतिक / धार्मिक / सामाजिक चेतना जागृत कर रहे हैं । पूज्य मुनि श्री द्वारा रचित सभी कृतियां बहुत लोकप्रिय हुई हैं । पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी द्वारा रचित यह लघु पुस्तक तीर्थंकर, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर अनेक जिज्ञासुओं / पत्रकारों की तीर्थंकरों के स्वरूप विषयक जिज्ञासाओं को सयुक्तिक, सटीक, हद्‍यस्पर्शी समाधान का प्रस्तुतिकरण है।
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सुखी जीवन की राह

हमारा सारा जीवन हमारे नजरिये पर निर्भर करता है. मनुष्य का जैसा नजरिया होता है, जैसा दृष्टिकोण होता है, उसका सारा जीवन वैसा बन जाता है. संत कहते हैं – बाहर की शुद्धि बहुत सरल है, अन्तःकरण की पवित्रता बहुत कठिन है. बच्चों को सुसंस्कारित बनाना आज की महती आवश्यकता है. शिक्षा के साथ संस्कारों का समारोपण कैसे हो, इसका प्रबंध करें. हम खुद संस्कारित हो, बच्चों को संस्कारित करें. न केवल पाठ पढ़े, अपितु उसका पारायण भी करें, तो हमारे जीवन का कल्याण निश्चत रूप से होगा. प्रस्तुत कृति प्राणी मात्र के लिए सुखी जीवन की राह प्रशस्त करती है......
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डॉ नीलम जैन, गुड़गाँव, मोबाइल - 09810809727
श्री सेवायतन
तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी में सर्वांगीण विकास का
सम्यक् यतन
तीर्थ हमारे प्राण हैं. तीर्थों की सुरक्षा हमारा परम दायित्व है. परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज की मंगल प्रेरणा से श्री सेवायतन का शुभारंभ हुआ. तीर्थों की सुरक्षा के लिये यह आवश्यक है कि क्षेत्र के मूल निवासियों को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार मिले जिससे कि वे क्षेत्र के विकास एवं सुरक्षा से अपने आप को जोड़ सकें, इसी दिशा में कार्यरत है श्री सेवायतन .. अधिक जानने के लिये क्लिक करें.
श्री सेवायतन - हिन्दी संस्करण

ShreeSevaytan - English Version
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गुणायतन
आत्मा से परमात्मा की यात्रा - आत्मविकास के सोपान
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. जैन दर्शन में जीव के आवेगों-संवेगों और मन-वचन-काय की प्रवत्तियों के निमित्त से अन्तरंग भावों में होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थानों द्वारा बताया जाता है. गुणस्थान जीव के भावों को मापने का पैमाना है. परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज की मंगल प्रेरणा से मधुबन, सम्मेदशिखरजी में निर्मित होने जा रहे, धर्मायतन "गुणायतन" में इन्हीं चौदह गुणस्थानों को "दृष्य-श्राव्य प्रस्तुति" के माध्यम से दर्शनार्थियों को समझाया जायेगा. परिसर में बनने वाले जिनालय, जैन स्थापत्य और कला के उत्कृष्ट उदाहरण होगें. अधिक जानने के लिये क्लिक करें.... गुणायतन
www.gunayatan.com
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तीर्थेश: श्रीसम्मेदशिखर
गुणायतन एवं श्रीसेवायतन का मुखपत्र - डाउनलोड करने हेतू क्लिक करें-तीर्थेश:श्रीसम्मेदशिखर तीर्थेश
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Updated 15-05-2013
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