02Oct2026: शिखरजी में श्री सेवायतन द्वारा नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया

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🔴 झलकियाँ 🔴
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🧘🏻‍♂ श्री सेवायतन नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर 🧘🏻‍♂
👉 दिनांक- 02 अक्टूबर 2026 👈
🔴 स्थल 🟡
🔵 गुणायतन, सम्मेद शिखर जी (झारखण्ड)
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श्री सेवायतन द्वारा स्वास्थ्य शिविर लगाया गया जिसमें 350 ग्रामीणों का नि:शुल्क स्वास्थ्य परीक्षण किया गया

गिरिडीह (श्री सम्मेद शिखरजी)
“गुणायतन” की सेवा गतिविधियों में सहयोग करने वाली संस्था श्री सेवायतन द्वारा गुणायतन के गौशाला परिसर में स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया। शिविर में मधुबन और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। करीब 350 लोगों ने अपना पंजीयन कराया, जिनका चिकित्सकों द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यक दवाइयां जरूरतमंदों को नि:शुल्क उपलब्ध कराई गईं। गुणा यत्न एवं श्री सेवायोजन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि श्री सेवायतन द्वारा आयोजित इस स्वास्थ्य शिविर का उद्देश्य मधुबन एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को सहज और नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध कराना है। शिविर में लोगों ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की जांच कराई और चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त किया।उन्होंने बताया कि गुणायतन द्वारा 10 बिस्तरों का सेवाभावी अस्पताल भी संचालित किया जा रहा है। अस्पताल में दो योग्य चिकित्सक सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक प्रतिदिन ओ पी डी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं,एवं मरीजों के लिए तीन एंबुलेंस की सुविधायें उपलब्ध है तथा आवश्यक दवाइयां भी नि:शुल्क प्रदान की जाती हैं। गुणायतन एवं श्री सेवायतन परिवार ने मधुबन तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों से इस सेवा का लाभ उठाने की अपील की है। उन्होंने बताया स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किसी प्रकार का पंजीयन शुल्क नहीं लिया जाता।

“पुण्य से मिले साधनों का सदुपयोग करें” : राष्ट्र संत मुनि श्री प्रमाण सागर

प्रात:कालीन धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को जीवन में शरीर, स्वास्थ्य, परिवार, धन, बुद्धि, शिक्षा और सम्मान जैसी जो सुविधाएं मिली हैं, वे केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि उनके सदुपयोग के लिए मिली हैं। व्यक्ति को स्वयं से बार-बार पूछना चाहिए कि मुझे क्या मिला, क्यों मिला, कैसे मिला और मैं उसका क्या उपयोग कर रहा हूं। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य अपने पास मौजूद उपलब्धियों को देखने के बजाय दूसरों के पास क्या है,यह देखता रहता है। दूसरों से तुलना करने से असंतोष बढ़ता है। इसके बजाय व्यक्ति को अपने जीवन में मिली सुविधाओं और अनुकूलताओं का मूल्य समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इच्छाएं होना स्वाभाविक है और आगे बढ़ने की इच्छा व्यक्ति को पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करती है, लेकिन जीवन में विकास पेड़ की तरह होना चाहिए। पेड़ जितना ऊपर बढ़ता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती जाती हैं। इसी प्रकार व्यक्ति जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने के साथ अपने संस्कारों और मूल्यों से जुड़ा रहे।मुनि श्री ने कहा कि पुण्य से प्राप्त साधनों का सदुपयोग करना ही जीवन की सार्थकता है। शरीर का उपयोग अच्छे कार्यों में, धन का दान और सेवा में तथा बुद्धि का उपयोग स्वयं और समाज के कल्याण में किया जाना चाहिए। पुण्य से मिले संयोगों का केवल भोग करने से पाप कर्म का बंध हो सकता है, जबकि उनका सदुपयोग पुण्य की वृद्धि का कारण बनता है।उन्होंने कहा कि संसार की भागदौड़ में व्यक्ति लगातार व्यस्त रहता है, लेकिन उसे यह भी विचार करना चाहिए कि इन सबके बीच वह आत्मकल्याण के लिए क्या कर रहा है। समय तेजी से बीत रहा है, इसलिए जीवन की दिशा को समय रहते पहचानना आवश्यक है। दूसरों से तुलना छोड़कर अपने जीवन में मिली उपलब्धियों को पहचानना और उनका सही उपयोग करना ही जीवन को सार्थक बनाता है।

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