श्रावक के बारह व्रत

261 261 admin
श्रावक के बारह व्रत
आशीर्वाद – मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज

व्रतों का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। व्रतों से ही जीवन की सार्थकता है। व्रत विहीन जीवन ब्रेक रहित गाड़ी की तरह है। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में व्रतों का पालन करना चाहिए।

प्रायः व्रत-संयम की चर्चा आते ही लोग इसे खान-पान की शुद्धि तक सीमित मानकर इसे एक जटिल प्रक्रिया मानते हैं।  जबकि अणुव्रतों का स्वरूप अत्यंत व्यापक है। एक दिन की हिंसा त्यागने वाले को यमपाल चांडाल को ही शास्त्रों में अणुव्रती कहा गया है।

परम पूज्य मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने बारह व्रतों की आधुनिक सन्दर्भ में व्याख्या कर इसे सर्व ग्राह्य और स्वीकार्य बना दिया है। मुनि श्री ने इन व्रतों की व्याख्या इस प्रकार की है कि साधारण व्यक्ति भी इनका पालन करके अपने जीवन का कल्याण कर सकता है। आप सभी सुधीजन व्रतों का पालन करें, इसी भाव से आपके लिए यह प्रस्तुत है।

ब्र. रोहित

पाँच अणुव्रत

अहिंसाणुव्रत

संकल्पी हिंसा का त्याग, मद्य-माँस-मधु का त्याग, चमड़े का त्याग, सिल्क और हिंसक सौंदर्य प्रसाधनों का त्याग

अतिचार

१. वध – किसी को मरना, पीटना

२. बंधन – पालतू पशुओं और आश्रित कर्मियों को जरूरत से ज्यादा नियंत्रण में रखना

३. छेदन – दुर्भावनापूर्वक नाक-कान आदि छेदना, नकेल लगाना, नाथ देना आदि

४. अतिभारारोपण – किसी पर अधिक भार लादना

५. अन्न पान निरोध – पालतू पशुओं और नौकर-चाकरों को समय पर भोजन नहीं देना, ठीक भोजन नहीं देना

सत्याणुव्रत

स्थूल झूठ का त्याग। जहाँ सच से काम चल जाये, वहाँ झूठ नहीं बोलना।

अतिचार

१. परिवाद किसी के साथ गली-गलौच करना

२. रहोभ्याख्यान – दुसरो की गुप्त बातों को उजागर कर देना

३. पैशून्य – चुगल खोरी

४. कूटलेख करना – नकली दस्तावेज बनाना, झूठी गवाही देना, जाली मुहर लगाना (यथासंभव बचें)

५. न्यासापहार – दूसरों की धरोहर हड़प लेना

अचौर्याणुव्रत

स्थूल चोरी, टाला तोड़ना, सेंध मरना, लूट-खसोट करना आदि का त्याग

अतिचार

१. चौर प्रयोग – चोरी की योजना बनाना, चोरों को प्रोत्साहित करना

२. चौरार्थ आदान – चोरी का माल खरीदना

३. विलोप – राजकीय नियमों का उल्लंघन करना (यथासंभव बचें)

४. प्रतिरूपक व्यवहार – मिलावट करना

५. हीनाधिक मानोन्मान – नाप-तौल में कमती-बढ़ती करना, डंडी मारना

ब्रह्मचर्याणुव्रत

अपने पति या पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य से शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना

अतिचार

१. पर विवाह करण – अपने पारिवारिक दायित्व से बहार के लोगों के शादी विवाह करने में रुचि लेना

२. इत्वरिका गमन – गलत चाल वाले विवाहित स्त्री/पुरुषों के साथ उठना-बैठना

३. अनंगक्रीड़ा – अप्राकृतिक यौनाचार करना

४. विटत्व – भोड़ापन करना, फूहड़पन अपनाना, भांडगिरी करना

५. विपुलतृषा – काम की तीव्र लालसा रखना

परिग्रह परिमाणव्रत

अपनी सम्पति की स्थूल सीमा बनाना

अतिचार

१. अति वाहन – अधिक भाग-दौड़ करना

२. अति संग्रह – अधिक मुनाफाखोरी की चाहत में जरूरत से ज्यादा संग्रह करना

३. अति विस्मय – अधिक लाभ में हर्ष और दूसरे के अधिक लाभ में विषाद करना

४. अति लोभ – मन चाहा लाभ होने पर भी और अधिक लाभ की चाह होना

५. अतिभार वहन – नौकर-चाकर और पालतू पशुओं से जरूरत से ज्यादा काम लेना, उनसे अधिक भाग-दौड़ कराना

तीन गुणव्रत

दिगव्रत

जीवन पर्यन्त के लिए दशों-दिशाओं की सीमा बनाकर उससे बाहर न आने-जाने का संकल्प, यथा-विदित विश्व से बाहर नहीं जाने का संकल्प, उर्ध्व एवं अधोदिशा में जहाँ तक आज के साधन जाते हैं उससे आगे न जाने का संकल्प लेना

अतिचार

१. उर्ध्व व्यतिक्रम – ऊपर की सीमा का उल्लंघन

२. अधो व्यतिक्रम – नीचे की सीमा का उल्लंघन

३. तिर्यक् व्यतिक्रम – तिरछी सीमा का उल्लंघन

४. क्षेत्र वृद्धि – लोभवश पूर्व निर्धारित क्षेत्र को बढ़ाना

५. स्मृत्यंतराधन – अपनी सीमा को भूल जाना

अनर्थदण्ड त्यागव्रत

प्रयोजनहीन पाप क्रियाओं का त्याग

भेद

१. पापोपदेश – बिना प्रयोजन पाप पूर्ण व्यापर आदि की प्रेरणा देना

२. हिंसा दान – हिंसक उपकरणों को प्रदान करना

३. अपध्यान – व्यर्थ में किसी की जीत-हार आदि का विचार करना

४. दु:श्रुति – चित्त को कलुषित करने वाला साहित्य पढ़ना, T.V. देखना, गीत आदि सुंनना

५. प्रमादचर्या – बिना मतलब पानी बहाना, अग्नि जलाना, धरती खोदना, पंखा चलाना, वनस्पति तोड़ना उक्त पाँचों प्रकार के अनर्थदण्ड का त्याग

 

अतिचार

१. कन्दर्प – फूहड़ हँसी-मजाक से युक्त अशिष्ठ वचन कहना

२. कौतकुच्य – हँसी मजाक के साथ शारीरिक कुचेष्टा करना

३. मौखर्य – अधिक बकवाद करना

४. अतिप्रसाधन – भोगोपभोग की सामग्री का आवश्यकता से अधिक संग्रह करना

५. असमीक्ष्य-अधिकरण – प्रयोजनहीन अधिक प्रवृति करना

भोगोपभोग परिमाणव्रत

भोग और उपभोग की वस्तुओं का सीमित समय अथवा जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना भोग – एक बार सेवन योग्य – भोजन आदि
उपभोग – बार-बार प्रयोग में आने योग्य – वस्त्राभूषण आदि

अतिचार

१. अनुपेक्षा – विषयों के प्रति उदासीनता न होना

२. अनुस्मृति – पूर्व में भोगे हुए विषयों की निरंतर स्मृति बने रहना

३. अति लौल्य – आगामी विषयों के प्रति अत्यधिक लोलुपता रखना

४. अति तृषा – भावी विषयों के प्रति तीव्र गृद्धता और तृष्णा का भाव रखना

५. अति अनुभव – विषयों का अति आसक्तिपूर्वक अनुभव करना

 

भोगोपभोग परिमाण व्रत इस प्रकार लें –

१-२. मद्य-माँस-मधु और मक्खन का आजीवन त्याग (त्रसघात और प्रमादवर्धक से बचने हेतु)

३. बहुविघात से बचने हेतु – सभी प्रकार के जमीकंद का त्याग करें तथा पत्तेदार सब्जियों का कम से कम  बरसात में त्याग

४. अनुपसेव्य – शिष्टजनों द्वारा सेवन के अयोग्य स्वमूत्रपान आदि के सेवन का त्याग

५. अनिष्ट – जो अपने स्वास्थ्य के अनुकूल न हो उसका त्याग

 

प्रतिदिन के नियम

  • भोजन – क्या और कितनी बार
  • वाहन – कितने
  • शयन – कितनी देर और किस प्रकार की शय्या
  • स्नान – कितनी बार
  • साबुन/तेल –
  • पुष्प –
  • प्रसाधन सामग्री –
  • पान/सुपारी –
  • आभूषण –
  • टी. वी. देखना / गीत-नृत्य करना –
  • काम सेवन / ब्रह्मचर्य –

उक्त बातों पर विचार करके अपनी सुविधानुसार सीमित समय के लिए नियम लेते रहें।

चार शिक्षाव्रत

देशव्रत

दिग्व्रत में स्वीकृत मर्यादा को सीमित समय के लिए और सीमित करना।
यह नियम घड़ी-घंटा, प्रहर, दिन-रात, सप्ताह, पक्ष, मास, ऋतू, वर्ष आदि की मर्यादा कर लिया जा सकता है।

अतिचार

१. आनयन – मर्यादित क्षेत्र के बाहर से किसी को बुलाना

२. प्रेष्य प्रयोग – मर्यादित क्षेत्र के बाहर किसी को भेजना

३. शब्दानुपात – मर्यादित क्षेत्र के बाहर शब्दों द्वारा संपर्क रखना, टेलीफोन/मोबाइल करना

४. रुपानुपात – मर्यादित क्षेत्र के बाहर स्थित व्यक्ति को अपने शारीरिक इशारे से अपनी ओर आकर्षित करना

५. पुद्गल क्षेप – मर्यादित क्षेत्र के बाहर स्थित व्यक्ति को कंकड़-पत्थर आदि फेंककर अपनी ओर आकृष्ट करना

सामायिक

प्रतिदिन दो समय सामायिक करना। सामायिक में पंच परमेष्टि का स्मरण, माला, जाप, आत्मचिंतन आदि करना चाहिए।

अतिचार

१. वचन दुष्प्रणिधान – वचनों की खोटी प्रवृति यथा – कुछ का कुछ पाठ करने लगना, सामायिक में बोल देना आदि

२. काय दुष्प्रणिधान – सामायिक में शरीर को स्थिर न रखना, अंगड़ाई लेना, जम्हाईयाँ आदि लेना

३. मन दुष्प्रणिधान – मन में अस्थिरता रखकर इधर-उधर की बातें सोचना

४. अनादर – सामायिक में उत्साह न होना

५. अस्मरण – सामायिक पाठ आदि भूल जाना

प्रोषधोपवास

अष्टमी-चतुर्दशी को एकाशन पूर्वक उपवास करना अथवा कम से कम अष्टमी-चतुर्दशी को एकाशन करना

अतिचार

१. बिना देखे – शोधे वस्तुओं को उठाना/ रखना

२. बिना देखे – शोधे अपने बिस्तर आदि को बिछाना

३. बिना देखे – शोधे अपने मल-मूत्र का त्याग करना

४. अनादर – सामायिक आदि आवश्यकों में आदर या उत्साह नहीं होना

५. अस्मरण – अपने आवश्यकों को ही भूल जाना

अतिथि संविभाग व्रत

उत्तम-मध्यम-जघन्य तीन प्रकार के पात्रों को आहार देकर भोजन करना
मुनियों की आहार बेला टालकर भोजन करना।
गाँव में मुनि हो तो यथा संभव आहार देकर या देखकर भोजन करना

(कहीं बाहर जाना हो या ट्रेन पकड़नी हो तो उसकी छूट)

अतिचार

१. सचित्त निक्षेप – सचित्त पत्र आदि पर भोज्य पदार्थ रखना

२. सचित अविधान – सचित पत्र आदि से भोज्य पदार्थ ढकना

३. परव्यपदेश – स्वयं देने योग्य वस्तु को दूसरों से दिलाना

४. मात्सर्य – अन्य दाताओं के गुणों को न सह पाना

५. कालातिक्रम – आहार के काल का उल्लंघन कर पड़गाहन आदि करना

उक्त बारह व्रतों का अतिचार रहित पालन करने से दूसरी प्रतिमा का अभ्यास हो सकता है।

Share
7 comments
  • Bahubali Dharmavir adadande January 21, 2024 at 11:46 am

    नमस्तो गुरुदेव नमस्तो गुरुदेव नमस्तो गुरुदेव
    बहुत ही सरल शब्दो मे 12 व्रतो का वर्णन, निश्चित ही गुरुदेव हम पालन करने लगेॅ है, खूप लाभान्वित हो रहे है. हमारी क्षयोपशम बडे…..आपका कृपा आशिश रहे.

    आपके उपदेशामृत का सदा हम पालन करते रहेंगे…

    बाहुबली धर्मवीर अडदंडे, हुन्नरगी,बेळगांवी,कर्नाटक

  • Sidhant Arya December 20, 2023 at 5:32 am

    Namostu 🙏🙏🙏

  • mauni mahaaraj October 18, 2022 at 7:00 pm

    Beautiful guide lines..
    Namastu

  • MEENU Jain September 8, 2022 at 4:03 am

    नमोस्तु गुरुदेव नमोस्तु गुरुदेव नमोस्तु गुरुदेव

    मेरी जिज्ञासा यह है कि यदि 10 लक्षण पर्व में हम महिलाओं को महावारी हो जाए और इसी बीच हमारा उपवास या व्रत चल रहा हो तो हमें इस समय क्या करना चाहिए ताकि हमें हमारे उपवास का फल मिल सके.

  • Shreyans Mehta March 26, 2022 at 4:40 pm

    Namostu Guru Dev 🙏🙏🙏🙏

  • Shreyans Mehta March 26, 2022 at 4:36 pm

    नमोस्तु गुरुवर,

    मैं श्रेयांस मेहता, जयपुर राजस्थान से हूं |
    मैं आपके सामने मेरी शंका रख रहा हूँ, मै धर्म ध्यान करता हूं, navkaar मंत्र लिखता हूँ, 108 माला फेरता हूं |

    मै आपसे मिलना चाहता हूं,मैने अपनी दादी, माँ जो अब इस दुनिया में नहीं है, उनकी बहुत सेवा की है, मैं आपसे आशीर्वाद चाहता हूँ |

    नमोस्तु नमोस्तु

  • Anuradha Kushwaha January 6, 2022 at 9:48 am

    Namostu gurudev 🙏🙏🙏

Leave a Reply