संसार छोड़ कर तीर्थक्षेत्र या गुरूचरणों में आने वाले के परिवारजन क्या करें?

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शंका

संसार छोड़ कर तीर्थक्षेत्र या गुरूचरणों में आने वाले के परिवारजन क्या करें?

समाधान

अगर कोई व्यक्ति अच्छे कार्य में लगता है तो हमें उसके लिए अनुमोदना करनी चाहिए; अनुमोदक बनना चाहिए, अवरोधक नहीं! कोई भी व्यक्ति यदि अच्छा कार्य करता है तो हमारे लिए बहुत प्रशंसनीय है और हमें उसका गर्व भी होना चाहिए। जैसे एक व्यक्ति यदि अपने घर के सारे दायित्वों को पूर्ण करके दीक्षा लेता है तो दीक्षित  होते समय उसके परिवार के लोगों को थोड़ी देर के लिए तकलीफ अवश्य होती है,किंतु बाद में उन्हें उसका गर्व होता है कि-मेरे पिता या मेरे भाई या मेरे पुत्र ने एक अच्छे रास्ते को अंगीकार किया, मेरी मां, मेरी बेटी या मेरी बहन ने एक अच्छे रास्ते को चुना!यह आपके लिए गर्व का विषय है और अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है और आप उसमें सहायक बनते हैं तो घर बैठे पुण्य अर्जित कर रहे हैं। घर का अगर सहयोग नहीं हो तो कोई व्यक्ति अच्छा कार्य कैसे कर सकता है? तो कोई भी व्यक्ति अपने घर की सारी जिम्मेदारियां पूर्ण करने के बाद किसी अच्छे कार्य के लिए अग्रसर होता है तो तुम उसमें सहायक बनो-” ठीक है! आप कीजिए, आपने जितने हमारे लिए करना था कर दिया, आगे मत सोचिए! हम अपने आप को संभाल लेंगे, आप अपना कल्याण कीजिए, अपना कार्य कीजिए। आप से प्रेरणा पाकर, हम भी आपके रास्ते पर चलेंगे” ऐसा कार्य करना चाहिए।

इस चीज की बहुत अच्छी शुरुआत होनी चाहिए और होने भी लगी है। गुणायतन में 4-5 सज्जन ऐसे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन अवैतनिक रूप से गुणायतन के लिए समर्पित कर दिया है। यह अपना समर्पण जब क्षेत्र के लिए करते हैं तो यह महान पुण्य का कारण बनता है। जो धर्मायतनों की रक्षा और सेवा करते हैं वे साता-बेदनी और देवायु का बंध करते हैं; प्रशस्त पुण्य प्रकृतियों के साथ सात से पुण्य बंद का कारण है। आचार्य अकलंक देव ने राज्यवार्तिक में देवायु और साता बेदनी के असुरों के हेतुओं में इन दो बातों को विशेष रूप से उल्लेखित किया कि- “धर्मायतनों की रक्षा और उनकी सेवा करने से लाभ मिलता है।” तो तुम्हारे घर का कोई सदस्य है ऐसा कार्य कर रहा है तो यह एक अच्छा कार्य हो रहा है। कोई भी व्यक्ति कहीं भी अच्छे रास्ते पर जाए तो उसकी अनुमोदना करो, आलोचना नहीं!

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