विदेशों में पढ़ने वाले बच्चों की संवेदनाएँ क्षीण होने का क्या कारण है?

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शंका

आजकल व्यक्ति विदेश में पढ़कर के अच्छी-अच्छी पोस्ट तो प्राप्त कर लेते हैं, जैसे डॉक्टर्स हैं, इंजीनियर्स हैं लेकिन उनकी संवेदना कम हो जाती है, क्या उनके आध्यात्मिक वस्तुओं के अभाव में उनको ऐसा होता है?

समाधान

यह संगति का असर है। विदेशों में संवेदना हैं ही नहीं, क्योंकि वहाँ टोटली कनज़्यूमराइजे़शन (पूर्ण उपभोक्तावाद) पूरी तरह से हावी है। बढ़ता हुआ उपभोक्तावाद अब भारत में भी बहुत तेजी से पाँव पसार रहा है। इसका दुष्परिणाम यह देखने को मिलता है कि यहाँ के लोगों की भी संवेदनायें दिनों-दिन क्षीण हो रही हैं। हमें इस उपभोक्तावाद की जगह अध्यात्मवाद का विकास करना होगा तभी हम लोगों की संवेदना को ठीक ढंग से प्रतिष्ठित कर सकेंगे।

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