सब के प्रति प्रेम कैसे रखें?

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शंका

सब के प्रति प्रेम कैसे रखें?

समाधान

मैत्री, प्रमोद आदि भावनाओं का मतलब क्या है, समझिये। आपने पूछा सबके प्रति प्रेम कैसे रखें? सबके प्रति मैत्री रखने का मतलब ‘किसी को दुःख न हो’ इस प्रकार की अभिलाषा। सबके प्रति प्रेम रखने का मतलब सबके हित की चिंता करना, किसी के प्रति द्वेष नहीं करना। लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैं, जहाँ हमें पूजा आराधना का सवाल आता है, तो उसमें हमें पूज्य अपूज्य का विवेक तो रखना ही पड़ता है। यदि सबके प्रति प्रेम रखने का मतलब यह है कि जो जैसी जिस अवस्था में हो, उसे स्वीकार ले तो यह एक प्रकार का विनय मिथ्यात्व हो जाएगा। हम स्वरूप की वन्दना करते हैं, रूप की नहीं। इसलिए, जहाँ स्वरूप ना दिखे वहाँ तटस्थ हो जाओ, ना राग रखो ना द्वेष। ध्यान रखना! राग यदि दोष है, तो द्वेष और बड़ा दोष है। इसलिए हमें neutral (तटस्थ) होना चाहिए, तटस्थ होना अप्रेम नहीं है। यह हमारी एक मर्यादा है, इसमें हमारे जीवन की सुरक्षा।

आपने पूछा अन्त भला तो सब भला कैसे करें? निश्चित अन्त का परिणाम बहुत अच्छा होता है। लेकिन इस बात को सदैव ध्यान रखना जिसका आदि अच्छा ना हो उसके अन्त अच्छा होने की सम्भावना बहुत कम होती है। इसलिए, ‘अन्त भला तो सब भला’ कहने की जगह ‘कर भला तो हो भला’ की बात सोचनी चाहिए।

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