विपरीत परिस्थितियों में धैर्य कैसे रखे?

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शंका

आप हमेशा कहते है कि हमें विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखना चाहिए। आप तो मुनि है, आपके लिए तो कदम कदम पर परिस्थितियाँ विपरीत होती हैं, हम सभी जानते हैं। आप के साथ घटित ऐसा कोई प्रसंग बताइए जिससे हम सबको प्रेरणा मिल सके?

समाधान

मनुष्य के पास यदि दृष्टि हो तो वो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी स्थिरता ला सकता है। आपने बिल्कुल सही कहा है कि मुनि जीवन में कदम-कदम पर विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और ऐसी स्थिति में अपने धैर्य, अपनी समझ के बल पर उसे अनुकूल बनाया जा सकता है। अपने प्रसंग पूछा अगर मैं कहूँ तो आज का पूरा सत्र उन प्रसंगों से भर जाएगा लेकिन फिर भी दो प्रसंग मै सुनाना चाहता हूँ। सन 2006 की बात है, कोलकाता से मुर्शिदाबाद की ओर विहार हो रहा था। रास्ते में बांग्लादेश की सीमा से लगा हुआ एक इलाका था जिसमें हिंदू समुदाय न के बराबर था। वहाँ के लोग धर्म सहिष्णु नहीं थे। अचानक एक स्थान पर मुझे 1500 से 2000 लोगों की भीड़ ने घातक अस्त्रों के साथ घेर लिया। जब मैं उधर से गुजर रहा था तो एक वर्ग था जो जगह जगह पर आरती उतारते, फूल बरसाते, शंकर की ध्वनि करते। मैं वहाँ से आगे बढ़ा लगभग एक किलोमीटर गया, मुझे लोगों ने बोला महाराज आगे 150-200 लोग खड़े हैं नुसेंस क्रियेट कर रहे है। मैंने कहा ठीक है, अब यहाँ रुकने से तो कोई फायदा नहीं है, चलो देखते हैं। कोलकाता की जैन समाज ने बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी थी। पुलिस का पूरा प्रोटेक्शन था, मेरे साथ एक कीगार्ड भी चल रही थी। लेकिन जब मैं नजदीक पहुँचा तो पता लगा 1500 -2000 लोग करीब वहाँ है। जब मैं उधर गया, मैं प्रायः जाप कराते हुए विहार करता हूँ। मैं जाप कर रहा था, सब विहार कर रहे थे, मेरे साथ करीब 60 लोग थे। मैं गया तो ऐसा हुआ जैसे उस भीड़ को किसी ने चीर दिया हो, रास्ता बन गया आगे बढ़ा, करीब 70-80 मीटर मैं आगे बढ़ गया। सामने से बस आई, उस 1500 से 2000 लोगों की भीड़ को 25 साल के 8-10 लड़के लीड कर रहे थे। उन्होंने उस बस को आड़ी लगवा लिया, बस भी उन्हीं के समुदाय की थी। हमारा रास्ता ब्लॉक हो गया, लोग घेर लिए। दाद देनी होगी कोलकाता की उन महिलाओं की, मेरे लिए दो घेरा तो पुरुषों का हुआ और बाहर का तीन घेरा महिलाओं ने बना दिया। पाँच घेरे के बीच मैं था, आगे झंडा चल रहा था। झंडेवाले के साथ छेड़छाड़ किया, झंडा फाड़ने की कोशिश की। सेकुरीटी (SECURITY) के कुछ गार्ड को लगा रखा था, उनके साथ लोगों ने मारा पीटी की। हमारे साथ के लोगों के साथ मारपीट करने की कोशिश की गई। कई तरह से लोगों ने कई तरह के खटकर्म किए। उसी घड़ी में लोग समझा बुझा भी रहे थे। उस घड़ी में मैंने देखा कि मेरी मौत मेरे सामने है। घातक अस्त्रों से वे लदे थे और उस समय मैंने एक ही बात सोची कि मुझे कोई मार नहीं सकता और जो मार सकता या जिसे मारा जा सकता है, वह मैं नहीं हूँ। अगर मेरी आयु का अन्त इनके निमित्त होना होगा, तो हो जाएगा। अब शान्त हो जाओ और मैं अपने आत्मा के स्वरूप का चिन्तन करते हुए स्थिर हो गया। मैंने जब तक यह उपसर्ग का निवारण न हो अन्न-जल का ऐसे तो त्याग था ही लेकिन अपने आपको, अपने आप तक सीमित कर लिया। उस घड़ी में मेरे मन में न भय हुआ न क्षोभ। थोड़ी देर में कुछ लोगों ने बीच-बचाव करके रास्ता निकाला, मैं निकला आगे बढ़ा, तब तक मेरे सिर पर एक इतना बड़ा पत्थर आ गया था, सिर फूट गया था, तेज खून की धार थी पर हमारे साथ वहाँ पर ब्रह्मचारी रोहित थे और एक लड़का था कोलकाता का, वह दोनों मुझे लेकर के तेजी से भाग गये। कहाँ से उनके पास ताकत आ गई, कहा नहीं जा सकता। तब तक फ़ोर्स आ गई, सब कुछ हो गया। एक बड़ी भयावह परिस्थिति थी, इसकी कहानी बहुत आगे तक चली। फिर उसके बाद साढे 4 किलोमीटर हमने उसी स्थिति में विहार किया लेकिन वहाँ मैंने देखा वहाँ जाने के बाद सब की हालत बदहवास सी थी। उस समय मुझे अपने शरीर की तो कोई चिन्ता ही नहीं हुई, खून बह रहा है। मैंने एक-एक को ढाढ़स बन्धवाया, सबको देखा। यह घटना घटी लगभग 5:30 और 7:45 बजे मैंने सिर का उपचार करवाया। उस घड़ी में जो विपरीत परिस्थिति थी धैर्य रखने का फायदा यह हुआ कि मन विचलित नहीं हुआ। कई बार ऐसी स्थिति आती है जब मन कुछ कहता है और होता कुछ है विपरीत स्थितियों में भी मन में निश्चिन्ता बनाना बड़ा कठिन होता है।

एक दूसरे तरीके का उदाहरण बताता हूँ। एक स्थान पर हम चातुर्मास करने के लिए गए, बुंदेलखंड से निकल कर के गए थे। उत्तर प्रदेश का इधर का कल्चर बिल्कुल बुंदेलखंड से अलग तो पता लगा एक चौका लगा है। जिस दिन नगर प्रवेश, उस दिन की कहानी है। जहाँ 25000 जैनी है, 3 साधुओं के उपस्थिति में नगर प्रवेश के दिन एक चौका लगा, वह भी कमेटी का, इंडिविजुअल नहीं। पड़गाहन में पुरुषों के नाम पर एक, वो भी कर्मचारी। ब्रह्मचारी के माध्यम से मालूम पड़ा, विहार कर के सुबह सुबह पहुँचे थे, 13 किलोमीटर चले थे। मैंने कहा- “है सो इनका होगा सो हमारा”। अब गुरु ने यहाँ का आदेश दिया है, तो यह मानकर के चलना है कि हमें सूखी धरती पर अपनी फसल उगानी है। हमने समता भाव से उसे स्वीकार किया, कोई भी नोटिस में नहीं लिया। बैनाडा परिवार आ गया था। वे 8 -10 लोग थे, उन्हीं ने लोगों से बात की, हमने कुछ नहीं कहा। उस घड़ी की प्रतिक्रिया वृत्ति ने पूरे चातुर्मास में चार चांद लगा दिए, जहाँ शुरुआत में यह हाल था वहाँ 25-25 चौके लगे और कहीं कोई दिक्कत नहीं रही। मै प्राय: इस बात का ध्यान रखता हूँ जब कभी विपरीत परिस्थितियाँ आये प्रतिकूल की अनुकूल व्याख्या कर लो, बुराई में अच्छाई देखो, दुःख में सुख खोजो और विपत्ति में सम्पत्ति का दर्शन करो, जीवन में बहुत आनन्द आयेगा।

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