प्रतियोगी या छात्र परीक्षा में सफलता न मिलने पर संबल कैसे रखें?

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शंका

मन को स्थिर कैसे किया जाए? विपरीत परिस्थितियों में, जैसे परीक्षा परिणाम आने के समय छात्र जीवन में संबल कैसे रखा जाए?

समाधान

विपरीत परिस्थितियों में मन का विचलित हो जाना प्रायः स्वाभाविक है, लेकिन उस समय भी यदि व्यक्ति सकारात्मक सोचने लगे तो अपने मन में स्थिरता आ सकती है। तो जब भी हमारे सामने कोई विपरीत स्थितियाँ आएँ और मन उद्विग्न और उद्वेलित होने लगे तो हम उसकी अनुकूल व्याख्या करना शुरू कर दें। प्रतिकूल की अनुकूल व्याख्या करने से व्यक्ति को बहुत राहत मिलती है। हमेशा पॉजिटिव सोचें। नकारात्मक दृष्टि से अपने आप को बचाएँ। यदि आपकी सोच पॉजिटिव होगी, नकारात्मकता से अपने आप को बचा लोगे, तो आप अपने मन के उद्वेलन को, मन की उथल-पुथल को बहुत सहजता से शान्त कर सकते हैं। जैसे, परीक्षा के अनुकूल परिणाम न आने पर मन में जो अस्थिरता आती है, उस समय यह सोचो कि ‘चलो ठीक है! इस बार हमें परीक्षा में अच्छा परिणाम नहीं आया, शायद हमारी मेहनत में कोई कमी होगी; हमने पर्याप्त प्रयास किया, परिणाम हमारे अनुकूल नहीं आया ये, हमारे भाग्य की कमी होगी, अगली बार हम और अपना शत-प्रतिशत इसमें लगाएँगे और इससे अच्छे अंक लेकर के अपने जीवन को आगे बढ़ाएँगे।’ यदि उस घडी में व्यक्ति पॉजिटिव सोचने लगे तो बहुत फर्क पड़ता है।

 फिर दूसरी बात यह देखना चाहिए, कि हम अगर परीक्षा में अनुकूल अंक नहीं पाए तो उसकी परवाह न करें, अपने मन को स्थिर रखें। परीक्षा में अधिक अंक लाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो परीक्षा की जिंदगी में आगे निकाल जाते हैं, लेकिन जिंदगी की परीक्षा में फेल हो जाते हैं। तो परीक्षा की जिंदगी में आगे आना बहुत महत्त्वपूर्ण बात नहीं है, जिंदगी की परीक्षा में सफल आना है। जिंदगी की परीक्षा में वे ही सफल होते हैं जो अपने जीवन में स्थिरता लाने का अभ्यासी बनते हैं। तो अपने जीवन में स्थिरता लाएँ। सोचें-‘चलो ठीक है! आज मेरे marks (अंक) कम आए, कोई बात नहीं। सब को इतने अंक नहीं आते इतने लोग बैठते हैं कोई कोई ही तो निकलता है।’ 

मेरे सम्पर्क में एक युवक था, उसने UPSC (सं.लो.से.आ.) का एक्ज़ाम दिया। तीन बार attempt (प्रयास) करने के बाद भी उसका चयन नहीं हुआ। यह सन २००२ की बात है जब हम फ़िरोज़ाबाद में थे। वह युवक जन्मत: जैन नहीं था, हमारे पास आया। हताशा के भाव उसके चेहरे पर दिख रहे थे। उसने कहा- ‘महाराज जी! मैं अपने जीवन से हार गया।’ अपना हाथ बढ़ाते हुए उसने कहा कि ‘थोड़ा देखकर बताइए कि मेरे जीवन में सफलता है भी या नहीं?’ मैंने उससे कहा कि “तुम जैसे तेजस्वी युवक को किसी के सामने हाथ फैलाता देख मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। यह तुम्हें शोभा नहीं देता! बात क्या है?” वह बोला “मैंने UPSC की तीन बार परीक्षा दी, इस बार MAINS निकालने के बाद इंटरव्यू भी देकर आया, फिर भी चयन नहीं हुआ। मैंने और भी जहां-जहाँ प्रयास किए मुझे परिणाम अच्छे नहीं मिले।” मैंने उसे झकझोरा, “यह बताओ UPSC में प्रतिवर्ष कितने लोग बैठते हैं?” उसने कहा- ‘लाखों!’ “उसमें से PRELIMINARY EXAM कितने लोग निकालते हैं?”, ‘हजारों!’ “और MAINS?” ‘उसमें से कुछ कम!’ “इंटरव्यू तक कितने जाते हैं?” ‘जितनी सीट होती हैं उससे ३ गुना!’ हमने कहा -“देखो! तुम कितने भाग्यशाली हो लाखों लोगों में से तुम INTERVIEW (साक्षात्कार) तक पहुंच पाए। तुम अपनी गणना उन भाग्यशाली में करो जिन्हें इंटरव्यू तक जाने का अवसर मिला। तुम्हारे अलावा लाखों लोग ऐसे हैं जो जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाते। हताश मत हो! तुम वहाँ तक तो पहुंचे, यह तुम्हारा achievement (उपलब्धि) है। आप जब प्रतियोगी परीक्षा में बैठते हो तो इन परीक्षाओं की सीट सीमित होती हैं। उन्हें कोई-कोई ही सफल हो पाता है, हर एक व्यक्ति नहीं जीत पाता। जैसे किसी खेल में अगर हर एक व्यक्ति जीत जाए तो फिर खेल का मजा क्या? इसी प्रकार प्रतियोगी परीक्षाओं में सभी सफल नहीं होते, कुछ लोग सफल होते हैं।”

“जो सफल नहीं हुए उन्हें स्वयं को असफल नहीं मानना चाहिए। यह देखना चाहिए कि जीवन जीने के लिए एक ही रास्ता नहीं है हमारे पास कदम कदम पर अवसर हैं।” मैंने उससे कहा-“तुम्हें तो वैसे भी हताश होने की आवश्यकता नहीं। तुम चार attempt दे सकते हो, अभी ३ दे चुके हो, इंटरव्यू तक पहुंच भी चुके हो। हो सकता है अगले प्रयास में तुम्हारा चयन हो जाए। और तुम घबराते क्यों हो अपने कैरियर के विषय में? कोई रिक्शा चला कर भी, अखबार बेचकर भी अपने जीवन जी लेता है, अपने परिवार को पाल लेता है। एक लड़का ट्यूशन पढ़ाकर भी अपने जीवन को बना लेता है। हर व्यक्ति आईएस नहीं होता। तुम प्रयास करो, जब तक अवसर है, अनुकूलता है, लगे रहो। और पर्याप्त प्रयास करने के बाद भी जब परिणाम न आए और अनुकूलता और अवसर न दिखे तो अपने प्रयत्न की दिशा को परिवर्तित करो।

मेरे उद्बोधन से उसके मन में बहुत संबल आया। वह बोला ‘मैं तो टूट चुका था। आपसे ऊर्जा लेकर जा रहा हूँ।” और उसने अपना चौथा प्रयास किया, २००३ में उसका अन्तिम चयन हो गया। तो जीवन में कभी हिम्मत नहीं हारना चाहिए, हर समय सकारात्मक सोचना चाहिए।

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