क्या अध्यापन से जीविकोपार्जन में भी पापार्जन होता है?

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शंका

आपसे सुना है कि जीविका उपार्जन में पाप का अर्जन होता है। मैंने 40-42 साल अध्यापन कार्य किया है, तो क्या इसमें पाप अर्जन हुआ है? यदि हुआ है, तो अब मुझे रिटायरमेंट के बाद क्या करना चाहिए?

डॉ पुष्पा जैन, बड़ौत

समाधान

आपने जिनको पढ़ाया है, लिखाया है, उनको आपने इकोनॉमिक्स पढ़ाया-लिखाया है-पैसा कमाने का, पैसा बचाने का, पैसे को मैनेज करने का तरीका। पैसा कैसे कमाया जाएगा? पेड़ पर तो लगेंगे नहीं, उन्हें आपने पैसा कमाने के लिए प्रशिक्षण दिया है और उस पैसे को कमाने में वे जो प्रयत्न करेंगे, उसमें जितना भी पाप करेंगे, उसके प्रेरक के रूप में आपकी भी भूमिका होगी। “तो फिर क्या हम पढ़ाना ही बंद कर दें?” मैं ऐसा नहीं कहता। मैं तो कहता हूँँ गृहस्थों के जीवन में बिना पाप के जीविका होती ही नहीं। अध्यापक व्यक्ति के जीवन का निर्माण करता है। वह उसे निर्वाह के योग्य बनाता है। इस दृष्टि अगर देखा जाए, तो आपने एक अच्छा कार्य किया है। 

अन्य प्रोफेशन की अपेक्षा, टीचिंग का प्रोफेशन, अध्यापन बहुत अच्छा कार्य है। उसमें व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का विकास होता है। लेकिन हाँ, यदि आपने उन्हें अर्थकरी विद्या के साथ, “सा विद्या या विमुक्तये” की उक्ति को चरितार्थ किया होता, तो आपने पढ़ाने की इस क्रिया में पुण्य का उपार्जन भी किया होता। आजकल की विद्या तो पूर्णतः अर्थकरी हो गई है- लर्निंग एँड अर्निंग। जबकि हमारी संस्कृति कहती है- लर्निंग-अर्निंग नहीं, लिविंग को देखो और जो हमारे सांस्कृतिक मूल्य हैं, उनको देखो। “सा विद्या या विमुक्तये“- वही विद्या है जो हमें छुटकारा दिलाये- बुराइयों से, विकृतियों से। तो हमें अभ्यास करना चाहिए, उसके लिए प्रयास करना चाहिए। 

आपने पूछा कि आपने पाप किया या नहीं? मैंने आईना आपके सामने रख दिया। आपको दिख तो रहा होगा कि आपने क्या किया! अब उसे साफ करने के लिए क्या करो? जितना बन सके पुण्य का कार्य करो, पुण्य अर्जन करो ताकि आपकी बैलेंस शीट अच्छी हो जाए। इकोनॉमिक्स में तो सबसे ज़्यादा ध्यान बैलेंस शीट पर ही दिया जाता है। तो जब आप यहाँ से जाएँ तो जितना लेकर आए थे, उससे ज़्यादा लेकर जाएँ। तब आपका यहाँ आना सार्थक होगा। कहीं ऐसा न हो कि यहाँ से जाएँ तो घाटे के साथ जाएँ, यह ठीक नहीं।

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