भाग्य कर्मों से बनता है या पुरुषार्थ से?

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शंका

भाग्य कर्मों से बनता है या पुरुषार्थ से?

समाधान

इस प्रश्न का उत्तर मैं कई बार दे चुका हूँ। मैं सार-संक्षेप में इतना ही कहना चाहता हूँ, इस झमेले में मत पड़ो, कोई भी कार्य करो तो ये सोच कर के करो कि “जो मैं करूँगा वैसा फल मुझे मिलेगा” और पर्याप्त प्रयास करने के उपरान्त भी यदि परिणाम ना आये, तो सोचो यही मेरे भाग्य में था। दोनों को सापेक्ष लेकर के चलोगे तो सुखी रहोगे और इनकी व्याख्या और विवेचना में उलझोगे तो उलझे ही रहोगे।

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