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प्रकाशित कृतियाँ 
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जैन तत्त्वविद्या
तीर्थंकर की कैवल्य - सागर से उद्‍भूत प्रथमानुयोग , करणानुयोग , चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग रूप अप्रतिम ' वेद - रत्नों ' की ज्ञानाभा को श्री माघनन्दि योगीन्द्र ने देवभाषा संस्कृत में दो सौ सूत्रों में निबद्ध किया । प्रज्ञाश्रमण दिगम्बर जैन मुनि प्रमाणसागर जी ने उन अमृत सूत्रों के हार्द को हद्‍यागंम किया । प्रस्तुत कृति " जैन तत्त्वविद्या " उसकी मुखर अभिव्यक्ति है । कृति में कृतिकार के परम वैदष्य / ज्ञानगाम्भीर्य / चिन्तन की सृजनशीलता और निर्गन्थ - श्रेयस - साधना का रूपायन भास्वर है । जैनागम के रत्नमयी तत्त्वों की सर्वोंमुखी - विधाएँ " जैन तत्त्वविद्या " में समाहित हो जाने से यह जैनधर्म की इनसाइक्लोपीडिया बन गई है । आलेखो , मानचित्रों , तालिकाओं एवं परिशिष्ट की समायोजना से कृति और अधिक प्रामाणिक / उपयोगी बन गई है।


 

Bhartiya Jnanpith
18 Institutional Area
Lodi Road
New Delhi- 110003

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तीर्थंकर
बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुनि श्री ने अपनी कठोर चर्या का दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए निरन्तर ज्ञान , ध्यान में लीन रहते है । अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी मुनि श्री एक ओर जहां अपने प्रभावक प्रवचनों से जनमानस में सांस्कृतिक / धार्मिक / सामाजिक चेतना जागृत कर रहे हैं , वही दूसरी ओर उनकी लेखनी ने अनेक ग्रन्थ रत्नों को जन्म दिया है । पूज्य मुनि श्री द्वारा रचित सभी कृतियां बहुत लोकप्रिय हुई हैं । पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी द्वारा रचित यह लघु पुस्तक तीर्थंकर , पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर अनेक जिज्ञासुओं / पत्रकारों की तीर्थंकरों के स्वरूप विषयक जिज्ञासाओं को सयुक्तिक , सटीक , हद्‍यस्पर्शी समाधान का प्रस्तुतिकरण है।


निर्ग्रन्थ फाउण्डेशन
अहिंसा
22, पुराना कबाड़खाना
भोपाल - 462001 (मध्यप्रदेश)

फोन - 0755 -2542346, 4275658
मोबाइल - 09425010161, 09425005624, 09425378118, 09827056550

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धर्म जीवन का आधार
शाश्वत सुख जीवन का लक्ष्य है । उसका स्त्रोत है मोक्ष । मोक्ष का मार्ग है आत्मस्वभाव रूप का अवलम्बन । आत्मस्वभाव के दशलक्षण है : उत्तम क्षमा , मार्दव , आर्जव , शौच , सत्य , संयम , तप , त्याग , आकिञ्‍चन्य और बह्मचर्य । इनका मर्म का हद्‍याह्रादक और हद्‍यस्पर्शी उद्‍घाटन किया गया है , प्रस्तुत ग्रन्थ में , एक़ युवा प्रतिभाशाली बहु श्रुत और अनुभूतियों की गहराई में उतरे हुए दिगम्बर संत की अतिशयकारी लेखनी के द्वारा , जिनका नाम है मुनि श्री प्रमाणसागर जी , जिनकी आत्मा सदा इस युग के विश्वविश्रुत संतशिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी के वात्सल्यमय आशीर्वाद से देदीप्यमान रहती है । धर्म जीवन का आधार एक ऐसी कृति है , जिसके अनुशीलन से धर्म के दशलक्षणों का स्वरूप सरलतया हद्‍यगम होगा और उनकी अभिव्यक्ति के लिए मन बैचन हो उठेगा।

 

 
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दिव्य जीवन का द्वार
संत कमल के फ़ूल की भांति लोक - जीवन के वारिधि में रहता है , संतरण करता है, डुबकियाँ लगाता है किन्तु डुबता नही । यही इस सदी के प्रखर क्रान्तिचेता आचार्य श्री विद्यासागर जी का मंत्रघोष है । शंख - नाद और सिंह - नाद ! जिसे मुनि श्री ने साकार किया । मुनि श्री के प्रवचनों का यह संकलन इसी की अभिव्यक्ति है । प्रतिफ़लन है आत्म- मंथन और चिंतन - मनन का । इनका अपना अलग वैशिष्ट्‍य है । मुनि श्री की व्यक्ति - चेतना की निजता ही इनका प्राण बिन्दु है । दरअसल, साध की निजता ही उसकी समूची पूंजी होती है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी के इन प्रवचनों में निजता के दर्शन होते हैं । शब्द -शब्द में उनकी क्रान्ति - चेतना का प्रतिबिंबन है , जो प्रवचन के कलेवर में श्रोता को संलग्न कर निरन्तर चैतन्य बनाये रहते हैं । आचार्य श्री दीक्षा- चेतना में तरूण तपस्वी प्रमाणसागर जी ने व्यक्ति - बोध से युग - बोध तक की जो अस्मिता यात्रा की है , उसी का प्रतिफ़लन इन शब्द - ध्वनियों में अनुगुंजित है , तरूणाई की उर्जा और निष्ठा की प्रखरता बनकर और प्रभावी इतनी कि शब्द अंतर को भेदते हुए हमारे मन को आंदोलित कर एक दिव्य चेतना दे देते है । आपाधापी की इस अंधी गति में जहां मनुष्य संवेदनशून्य बनकर निष्प्राण - सा भाग रहा है , चेतना के विध्वंस और संस्कृति के दमन की इस अभिशप्त बेला में अपनी अस्मिता के प्रति बेखबर है , ये प्रवचन उसे थमकर , बैठकर शांति से सोचेने - विचारने को आत्मबोध देते है, जो इन प्रवचनों की आत्म और युग - बोध है संतत्व का महत्वपूर्ण क्षण।

 

 
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ज्योतिर्मय जीवन
जो शुभ है , वह जीवन को ज्योतिर्मय बनाता है , जबकि अशुभ से जीवन में अन्धकार छा जाता है । हमें वही आलेख या प्रवचन पढने - सुनने चाहिये , जो जीवन को प्रकाश से भर दें । सारी अच्छाइयां ही जीवन का प्रकाश है । पूज्य मुनि श्री की यह पुस्तक अथ से इति तक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' स्वर्णिम सूत्र को पकड़कर ही आगे बढ़ी है। मानव जीवन को सुन्दर , सुपथगामी और सुखी बनाने की चेष्टा दिखाई देती हैं - पूज्य मुनि श्री इन अमृतमयी प्रवचनों में । धर्म एक जीवन्त शक्ति है । पूज्य मुनि श्री स्वयं में धर्म की गंगोत्री ही हैं । उनके चिन्तन और चलन में अभिन्नता है । जो उनके आचरण में है , वही उनकी जिव्हा पर आता है और इसीलिए हमारे चित्त पर अद्‍भुत प्रभाव छोड़ता है । उनके इन प्रवचनों में मर्त्य मानव को अमरता के संस्कार उपलब्ध हो सकते है।

 

 
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अंतस की ऑंखें
मुनि प्रमाणसागर की वाणी में जो ओज है , अभिव्यक्ति में मधुरता है और अद्‍भुत आकर्षण जो श्रोता समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किये बिना नही रहता । इन नये दशको में क्रान्त - दृष्टा पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी परम तपस्वी दिगम्बर जैनाचार्य १०८ श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का सान्निध्य पाकर पूरी तरूणाई में प्रखर साधु के रूप में जैन परम्परा में विद्यमान है। आपके प्रवचनों में मौलिकता और उपयोगिता है जो जन समुदाय को सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेता है । इनमें मुनि श्री की निजता अभिव्यञ्‍चित होती है। प्रवचन की विषय वस्तु , शब्द , संयोजना , प्रस्तुति एवं प्रभावकर्त्ता ने कृति को विलक्षण बना दिया है। सम्यग्दर्शन के विभन्न अंगों की हद्‍यस्पर्शी विवेचना पढ़कर एक मनुष्य पूर्ण मनुष्य कैसे बन सकता है , इसका सहज बोध होता है। मुनि श्री द्वारा जिस विलक्षणता के साथ तत्त्वों की विवेचना की गई है , वह प्राणों को मोहित करने में समर्थ है। मुनि श्री जो महामौन के महासंगीत में विराजमान रहते है, के प्रवचन अनुकम्पा से अनुग्रहित है।

 

 
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पाठ पड़े नवजीवन का

छोटे-छोटे व्यसन धीरे-धीरे बहुत बड़ा रूप धारण कर लेतें हैं । प्रस्तुत पुस्तक में पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मुखार्विन्द से प्रवाहित प्रखर वाणी का संकलन है । मुनि श्री द्वारा जबलपुर महानगर में दस-दिवसीय-प्रवचनमाला में विभिन्न विषयों पर मंगल प्रवचन रूपी अमृतवर्षा हुई । जीवन की सार्थकता , दुखमुक्ति के उपाय, सुख का मूल संतोष, मन चंगा तो कठोती में गंगा, प्रसन्नता का राजमार्ग, धर्म और जीवन व्यवहार, घर-परिवार में नारी, सम्बन्ध पिता-पुत्र के, विलुप्त होते संस्कार और जीवन-मूल्य, धर्म और युवा आदि विषयों पर मुनि श्री की प्रवचन शैली श्रोताओं को सोचने पर विवश कर देती है।

 

 
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धर्म साधिये जीवन में

जैन उपासना एवं साधना के मार्ग में निरन्तर विकास एवं स्थायित्व के लिए अनेक प्रकार की भावनाओं का विचार किया गया है । कभी व्रतों की सुरक्षा के लिए भावनाओं को भाने का परामर्श दिया, तो कभी व्यवहार की समीचीन प्रवृति के लिए भावनाओं का आश्रय लेने की बात कही । संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति - वैराग्य के लिए बारह भावनाओं का अबलम्बन लेने का निर्देश भी दिया गया । बारह भावनाओं का चिन्तवन किसी भी साधक के लिए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य होता है। आचार्यों की जनहितकारी वाणी में इन बारह भावनाओं की विस्तृत व्याख्याएँ - विवेचनाएँ प्रस्तुत हुई हैं । इन्हीं को सूत्र रूप से आश्रयीभूत करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी प्रखर शैली में प्रवचन देकर जनमानस को कृतार्थ किया है । प्रस्तुत कृति में बारह पाठों के माध्यम से जैनधर्म के अनेक गूढ़ सिद्धान्तों एवं रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।

 

 
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मर्म जीवन का
जीवन की सार्थकता के लिए  प्रथम सीढ़ी स्वरूप सम्यक्त मान्य है. मुनिश्री के गया प्रवास के  अवसर पर सैद्धान्तिक एवं आध्यात्मिक विषय सम्यग्दर्शन के आठ अंगो के आधार पर दी गयी प्रेरणाओं को सन्कलित करती है प्रस्तुत कृति.......

 
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सुखी जीवन की राह
हमारा सारा जीवन हमारे नजरिये पर निर्भर करता है. मनुष्य का जैसा नजरिया होता है, जैसा दृष्टिकोण होता है, उसका सारा जीवन वैसा बन जाता है. संत कहते हैं – बाहर की शुद्धि बहुत सरल है, अन्तःकरण की पवित्रता बहुत कठिन है. जब तक कोई क्रिया आत्मस्पर्शी नहीं बनती, कल्याणकारी नहीं बनती.
बच्चों को सुसंस्कारित बनाना आज की महती आवश्यकता है. शिक्षा के साथ संस्कारों का समारोपण कैसे हो, इसका प्रबंध करें. हम खुद संस्कारित हो, बच्चों को संस्कारित करें. न केवल पाठ पढ़े, अपितु उसका पारायण भी करें, तो हमारे जीवन का कल्याण निश्चत रूप से होगा. प्रस्तुत कृति प्राणी मात्र के लिए सुखी जीवन की राह प्रशस्त करती है......   

 
Home आभार - डॉ. नीलम जैन , गुड़गाँव मुखपृष्ठ

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