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कृतियाँ
साहित्य प्राप्ति स्थान
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जैन धर्म और दर्शन
जैन  धर्म और दर्शन के विशाल परिप्रेक्ष्य में ही इस ग्रंथ में, जैन इतिहास के कालक्रम का विश्व के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुतिकरण किया गया है। जिसे पढ़ कर मन एक ओर जिज्ञासामय समुद्र बन जाता है तो दूसरी ओर "समाधान" के रत्नों से संतुष्ट भी। जैन सिद्धांतो का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण इस कृति की अपनी मौलिक विशेषता है। "जैन धर्म" और दर्शन बड़ा जटिल विषय है। उसकी पारिभाषिक शब्दावली में सामान्य पाठक तो क्या प्रबुद्ध वर्ग भी प्रायः उलझ जाता है, किन्तु मुनिश्री ने इस पुस्तक में गूढ़ से गूढ़ तत्वों को भी सरल तथा लोकभाषा में समझाया है। उन्होंने विश्व के विख्यात दार्शनिक, विज्ञानवेत्ताओं के मतों को मूल शब्दाबली में परिभाषित किया है। इस शब्दावली को उन्होंने सुगम एवं बोधगम्य बना दिया है। प्रामाणिकता की दृष्टि से उन्होंने यथास्थान संदर्भ भी दे दिये हैं।
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जैन तत्त्वविद्या
जैन धर्म की एनसाइक्लोपीडिया जैन तत्व विद्या में प्रज्ञा श्रमण निर्ग्रंथ गौरव मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने अपने ज्ञान गाम्भीर्य से जैन धर्म की विशिष्टताओं, तीर्थंकर का जीवन, पंचकल्याणक, अनेक साधना सूत्रों एवं दिव्य देशना से निसृत कर्म सिद्धान्त, त्रिरत्न, श्रमण धर्म, श्रावक धर्म, द्रव्य, तत्व एवं पदार्थ के साथ तीनों लोकों की संरचना को वर्तमान युग की वैज्ञानिक आधुनिक भाषा में परिभाषित किया है तथा जैन इतिहास एवं सिद्धान्तों का विश्व के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुतिकरण किया है। इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। दर्शन और इतिहास के शोधार्थियों के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में यह कृति अपना विशेष स्थान बना चुकी है। युवाओं एवं धर्म दर्शन के समस्त अध्येत्ताओं को आकर्षित करने वाली इस विशष्ट कृति के भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली द्वारा सन् 2000 से अब तक दस संस्करण प्रकाशित हो चुकें हैं तथा लाखों की संख्या में पाठकों की प्रिय पुस्तक जैन तत्त्व विद्या पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।
 
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तीर्थंकर
बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुनि श्री ने अपनी कठोर चर्या का दृढ़तापूर्वक पालन करते हुए निरन्तर ज्ञान , ध्यान में लीन रहते है । अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी मुनि श्री एक ओर जहां अपने प्रभावक प्रवचनों से जनमानस में सांस्कृतिक / धार्मिक / सामाजिक चेतना जागृत कर रहे हैं , वही दूसरी ओर उनकी लेखनी ने अनेक ग्रन्थ रत्नों को जन्म दिया है । पूज्य मुनि श्री द्वारा रचित सभी कृतियां बहुत लोकप्रिय हुई हैं । पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी द्वारा रचित यह लघु पुस्तक तीर्थंकर, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर अनेक जिज्ञासुओं / पत्रकारों की तीर्थंकरों के स्वरूप विषयक जिज्ञासाओं को सयुक्तिक, सटीक, हद्‍यस्पर्शी समाधान का प्रस्तुतिकरण है।
 
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धर्म जीवन का आधार
शाश्वत सुख जीवन का लक्ष्य है । उसका स्त्रोत है मोक्ष । मोक्ष का मार्ग है आत्मस्वभाव रूप का अवलम्बन । आत्मस्वभाव के दशलक्षण है : उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्‍चन्य और बह्मचर्य। इनका मर्म का हद्‍याह्रादक और हद्‍यस्पर्शी उद्‍घाटन किया गया है , प्रस्तुत ग्रन्थ में , एक़ युवा प्रतिभाशाली बहु श्रुत और अनुभूतियों की गहराई में उतरे हुए दिगम्बर संत की अतिशयकारी लेखनी के द्वारा , जिनका नाम है मुनि श्री प्रमाणसागर जी, जिनकी आत्मा सदा इस युग के विश्वविश्रुत संतशिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी के वात्सल्यमय आशीर्वाद से देदीप्यमान रहती है । धर्म जीवन का आधार एक ऐसी कृति है , जिसके अनुशीलन से धर्म के दशलक्षणों का स्वरूप सरलतया हद्‍यगम होगा और उनकी अभिव्यक्ति के लिए मन बैचन हो उठेगा।
 
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दिव्य जीवन का द्वार
संत कमल के फ़ूल की भांति लोक - जीवन के वारिधि में रहता है , संतरण करता है, डुबकियाँ लगाता है किन्तु डुबता नही । यही इस सदी के प्रखर क्रान्तिचेता आचार्य श्री विद्यासागर जी का मंत्रघोष है । शंख - नाद और सिंह - नाद ! जिसे मुनि श्री ने साकार किया । मुनि श्री के प्रवचनों का यह संकलन इसी की अभिव्यक्ति है । प्रतिफ़लन है आत्म- मंथन और चिंतन - मनन का । इनका अपना अलग वैशिष्ट्‍य है । मुनि श्री की व्यक्ति - चेतना की निजता ही इनका प्राण बिन्दु है । दरअसल, साध की निजता ही उसकी समूची पूंजी होती है । मुनि श्री प्रमाणसागर जी के इन प्रवचनों में निजता के दर्शन होते हैं । शब्द -शब्द में उनकी क्रान्ति - चेतना का प्रतिबिंबन है , जो प्रवचन के कलेवर में श्रोता को संलग्न कर निरन्तर चैतन्य बनाये रहते हैं । आचार्य श्री दीक्षा- चेतना में तरूण तपस्वी प्रमाणसागर जी ने व्यक्ति - बोध से युग - बोध तक की जो अस्मिता यात्रा की है , उसी का प्रतिफ़लन इन शब्द - ध्वनियों में अनुगुंजित है , तरूणाई की उर्जा और निष्ठा की प्रखरता बनकर और प्रभावी इतनी कि शब्द अंतर को भेदते हुए हमारे मन को आंदोलित कर एक दिव्य चेतना दे देते है । आपाधापी की इस अंधी गति में जहां मनुष्य संवेदनशून्य बनकर निष्प्राण - सा भाग रहा है , चेतना के विध्वंस और संस्कृति के दमन की इस अभिशप्त बेला में अपनी अस्मिता के प्रति बेखबर है , ये प्रवचन उसे थमकर , बैठकर शांति से सोचेने - विचारने को आत्मबोध देते है, जो इन प्रवचनों की आत्म और युग - बोध है संतत्व का महत्वपूर्ण क्षण।
 
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ज्योतिर्मय जीवन
जो शुभ है , वह जीवन को ज्योतिर्मय बनाता है , जबकि अशुभ से जीवन में अन्धकार छा जाता है । हमें वही आलेख या प्रवचन पढने - सुनने चाहिय, जो जीवन को प्रकाश से भर दें। सारी अच्छाइयां ही जीवन का प्रकाश है । पूज्य मुनि श्री की यह पुस्तक अथ से इति तक 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' स्वर्णिम सूत्र को पकड़कर ही आगे बढ़ी है। मानव जीवन को सुन्दर, सुपथगामी और सुखी बनाने की चेष्टा दिखाई देती हैं - पूज्य मुनि श्री इन अमृतमयी प्रवचनों में । धर्म एक जीवन्त शक्ति है । पूज्य मुनि श्री स्वयं में धर्म की गंगोत्री ही हैं । उनके चिन्तन और चलन में अभिन्नता है। जो उनके आचरण में है , वही उनकी जिव्हा पर आता है और इसीलिए हमारे चित्त पर अद्‍भुत प्रभाव छोड़ता है। उनके इन प्रवचनों में मर्त्य मानव को अमरता के संस्कार उपलब्ध हो सकते है।
 
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अंतस की आँखें
मुनि प्रमाणसागर की वाणी में जो ओज है , अभिव्यक्ति में मधुरता है और अद्‍भुत आकर्षण जो श्रोता समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किये बिना नही रहता । इन नये दशको में क्रान्त - दृष्टा पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी परम तपस्वी दिगम्बर जैनाचार्य १०८ श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का सान्निध्य पाकर पूरी तरूणाई में प्रखर साधु के रूप में जैन परम्परा में विद्यमान है। आपके प्रवचनों में मौलिकता और उपयोगिता है जो जन समुदाय को सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेता है । इनमें मुनि श्री की निजता अभिव्यञ्‍चित होती है। प्रवचन की विषय वस्तु , शब्द , संयोजना , प्रस्तुति एवं प्रभावकर्त्ता ने कृति को विलक्षण बना दिया है। सम्यग्दर्शन के विभन्न अंगों की हद्‍यस्पर्शी विवेचना पढ़कर एक मनुष्य पूर्ण मनुष्य कैसे बन सकता है , इसका सहज बोध होता है। मुनि श्री द्वारा जिस विलक्षणता के साथ तत्त्वों की विवेचना की गई है , वह प्राणों को मोहित करने में समर्थ है। मुनि श्री जो महामौन के महासंगीत में विराजमान रहते है, के प्रवचन अनुकम्पा से अनुग्रहित है।
 
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पाठ पढ़े नव जीवन का
छोटे-छोटे व्यसन धीरे-धीरे बहुत बड़ा रूप धारण कर लेतें हैं । प्रस्तुत पुस्तक में पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मुखार्विन्द से प्रवाहित प्रखर वाणी का संकलन है। मुनि श्री द्वारा जबलपुर महानगर में दस-दिवसीय-प्रवचनमाला में विभिन्न विषयों पर मंगल प्रवचन रूपी अमृतवर्षा हुई। जीवन की सार्थकता, दुखमुक्ति के उपाय, सुख का मूल संतोष, मन चंगा तो कठोती में गंगा, प्रसन्नता का राजमार्ग, धर्म और जीवन व्यवहार, घर-परिवार में नारी, सम्बन्ध पिता-पुत्र के, विलुप्त होते संस्कार और जीवन-मूल्य, धर्म और युवा आदि विषयों पर मुनि श्री की प्रवचन शैली श्रोताओं को सोचने पर विवश कर देती है।
 
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धर्म साधिये जीवन में
जैन उपासना एवं साधना के मार्ग में निरन्तर विकास एवं स्थायित्व के लिए अनेक प्रकार की भावनाओं का विचार किया गया है । कभी व्रतों की सुरक्षा के लिए भावनाओं को भाने का परामर्श दिया, तो कभी व्यवहार की समीचीन प्रवृति के लिए भावनाओं का आश्रय लेने की बात कही । संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति - वैराग्य के लिए बारह भावनाओं का अबलम्बन लेने का निर्देश भी दिया गया । बारह भावनाओं का चिन्तवन किसी भी साधक के लिए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य होता है। आचार्यों की जनहितकारी वाणी में इन बारह भावनाओं की विस्तृत व्याख्याएँ - विवेचनाएँ प्रस्तुत हुई हैं । इन्हीं को सूत्र रूप से आश्रयीभूत करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी प्रखर शैली में प्रवचन देकर जनमानस को कृतार्थ किया है । प्रस्तुत कृति में बारह पाठों के माध्यम से जैनधर्म के अनेक गूढ़ सिद्धान्तों एवं रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।
 
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मर्म जीवन का
जीवन की सार्थकता के लिए  प्रथम सीढ़ी स्वरूप सम्यक्त मान्य है. मुनिश्री के गया प्रवास के  अवसर पर सैद्धान्तिक एवं आध्यात्मिक विषय सम्यग्दर्शन के आठ अंगो के आधार पर दी गयी प्रेरणाओं को सन्कलित करती है प्रस्तुत कृति.......
 
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सुखी जीवन की राह
हमारा सारा जीवन हमारे नजरिये पर निर्भर करता है. मनुष्य का जैसा नजरिया होता है, जैसा दृष्टिकोण होता है, उसका सारा जीवन वैसा बन जाता है. संत कहते हैं – बाहर की शुद्धि बहुत सरल है, अन्तःकरण की पवित्रता बहुत कठिन है. जब तक कोई क्रिया आत्मस्पर्शी नहीं बनती, कल्याणकारी नहीं बनती.
बच्चों को सुसंस्कारित बनाना आज की महती आवश्यकता है. शिक्षा के साथ संस्कारों का समारोपण कैसे हो, इसका प्रबंध करें. हम खुद संस्कारित हो, बच्चों को संस्कारित करें. न केवल पाठ पढ़े, अपितु उसका पारायण भी करें, तो हमारे जीवन का कल्याण निश्चत रूप से होगा. प्रस्तुत कृति प्राणी मात्र के लिए सुखी जीवन की राह प्रशस्त करती है......
 
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लक्ष्य जीवन का

उपक्रम अपने आप का...

जो अपनीजीवन वीणा को पहचान लेते हैं, उनका जीवन संगीत है और जो इसे नहीं जानते उनका जीवन सिरदर्द हैं । परम पूज्य गुरुदेव श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने अपनी जीवन वीणा को न केवल जाना पहचाना है अपितु उनकी जीवन वीणा से नि:श्रृत अमृत प्रवचनों ने आज की इस लस्त-पस्त और व्यस्त जिन्दगी को एक सीख दी है कि, जिद्दी मत बनिये, जिंदादिल बनिये । रोबीले मत बनिये, रसीले बनिये । जिन्दादिल और रसीले बनने के लिए हमारे जैसे विचार होते हें, वैसी हमारी प्रवृत्ति होती हैं । जैसी प्रवृत्ति होती हैं, वैसा हमारा व्यवहार होता है और जैसा हमारा व्यवहार होता है वैसा हमारा जीवन बनता हे । इसलिए बेहतर साबित करने से कोई लाभ नहीं, बेहतर बनने की कोशिश कीजिये। परेशानियाँ आयेंगी, असफलता भी हाथ लगेगी । उस समय प्रतिकूलताओँ में घबडाओ मत, प्रतिकूलता क्रो अनुकूलताओँ में परिवर्तित करो और दूसरी बात जीवन में कैसी भी विषमता क्यों न आये हताशा को अपने चित्त पर हाबी नहीं होने दो । और यदि हम यह अपने जीवन में घटित कर सके तो पूज्य गुरुदेव विश्वास दिलाते हैं कि, मनुष्य के विश्वास और पुरुषार्थ से उसके कर्म की रेखायें भी परिवर्तित हो जाती हैं। अनादिकाल से संसार में भटकते हम सभी के लिए एक वहुत बड़ा सन्देश है यह, आश्वस्ति भी और लक्ष्य भी। आइये जीवन के इस लक्ष्य को पाने के लिए हम सभी कृत संकल्पित हों, इसी भावना के साथ परमपूज्य गुरुदेव के प्रवचनों की यह मंजूषा है लक्ष्य जीवन का है समर्पित है।

सिंघई जयकुमार जैन

 
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कर्म जीवन का
श्रमण संस्कृति की मुख्य विचारधारा है – कर्मशील होना । श्रमाधारित होने से संभवत: इस संस्कृति का नामकरण श्रमण किया गया होगा । यह श्रम लौकिक और अलौकिक रूप से संभावित हो सकता है । किंन्तु यह श्रम मात्र श्रम नहीं है, अपितु इसमें श्रद्धात्मक मनोदशा का होना अनिवार्य है । जब तक श्रद्धात्मक श्रम नहीं होता तब तक वह मात्र परिश्रम तो हो सकता किन्तु परिणामदायी हो यह आवश्यक नहीं है और बिना परिणामदायी श्रम करने की सीमा तो अन्तहीन ही होगी । जैसे जल के मन्थन से झाँक तो आता है किंन्तु मक्खन निकाल पाना संभावित नहीं है। श्रमण के श्रम का द्वितीय आधार उनका ज्ञान या विवेक भी होता है यद्यपि दूध के मन्थन से नवनीत प्राप्त किया जाता है, किन्तु वह जल के मन्थन से कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । लेकिन यह जानना ही पर्याप्त नहीं है कि दूध से नवनीत मिलता है । अपितु दूध नहीं दही के द्वारा प्राप्त होता है, दही की भी ठीक ठीक अवस्था होने पर नवनीत प्राप्त होता है । विकृति की दशा में नवनीत नहीं हीं मिलता या कम विकृत होने पर यदि प्राप्त हो सकता है तो वह भी विकृत ही होता है। इसी तरह श्रमण का श्रम भी परमार्थ की भावना से ओतप्रोत तथा सकारात्मक विश्वास से निर्मित होता है । गृहस्थ उसकी आरम्भिक आधार होता है। इस भूमि पर उसकी निश्चल भित्ति अवस्थित होती है । जैन परम्परा में गृहस्थों के प्रतिदिन के कर्त्तव्य कार्यों का भी विभाजन किया गया है । उसके ये कर्म श्रद्धा, विवेक और कियाशीलता के विस्तार स्वरूप ही होते हैं । देवपूजा एवं गुरूपास्ति उसकी प्रगाढ़ श्रद्धा को प्रदर्शित करते है। स्वाध्याय एवं दान विवेकाश्रित होते है तप एवं संयम स्व-परोपकार की कियाशीलता को निर्धारित करते हैं। स्वस्थ मानसिकता वाले गृहस्थ के लिए पूर्वाचार्यों के द्वारा निरूपित इन कर्मों का करना सहज एवं सरल होता है । इनसे उसकी वृत्ति नियंत्रित एवं लयबद्ध रहती है । जीवन की लयबद्धता का जो दुर्लभ सुख है वह इन नियमों की सीमा में बद्ध होने पर अनुभूत किया जा सकता है। मुनिश्री प्रमाणसागर जी द्वारा गृहस्थ के षट् कर्मों पर जो चिन्तन दिया गया है वह कई मायनों में अश्रुतपूर्व व महनीय है । यद्यपि उनके प्रत्येक वचन/ प्रवचन चिन्तन की गहनघारा से नि:सृत होता है, जिसे आगम का आधार प्राप्त रहता है । प्रस्तुत संकलन के लगभग सभी प्रवचन महत्त्वपूर्ण है । इनमें भी दान के विषय में दिये गये उपदेश समसामयिक एवं जनोपयीगी के साथ तार्किक भी हैं । इन जैसे निर्भीक उपदेशकों के द्वारा ही ऐसी वचनावली नि: सृत हो सकती है, जो प्रचलित अनेक रूढियों / परम्पराओं को निरर्थक एवं निर्जीव घोषित करने का साहस रखती है अपेक्षा है कि दान के विषय में विचलित वर्तमान मानकों के साथ इन विचारों का तुलनात्मक व गहन विचार- विमर्श हो तभी उसके यथार्थ स्वरूप की जानकारी हासिल हो सकती है । इस प्रकार का मनन… चिन्तन ही समाज को नईं दिशा प्रदान कर सकता है। ............राकेश जैन
 
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जैन सिद्धांत शिक्षण
जैन दर्शन यथार्थवादी वैज्ञानिक दर्शन है। इसमें प्रयुक्त शब्दों और पदों के निश्चित और सुपरिभाषित अर्थ हैं। इनको सम्यक् रूप से समझे विना जैन धर्म-दर्शन की गहनता, व्यापकता और मार्मिकता को आत्मसात नहीं किया जा सकता है । पर जैन दर्शन को बहुधा कठिन और दुरुह विषय माना जाता है। संभवत: इसका कारण जैन दर्शन की अपनी विशिष्ट परिभाषावली है। परमपूज्य निर्ग्रन्थ सन्त शिरोमणी आचार्यश्री विद्यासागरजी के सुयोग्य शिष्य मुनिश्री प्रमाणसागरजी के भोपाल प्रवास के दौरान भोपाल नगर के विज्ञजनों से महाराजश्री की चर्चा में यह बात सामने आई कि एक ऐसी पुस्तक का प्रणयन हो जो जैन धर्म-दर्शन के प्रारंभिक अध्येताओं के लिये व्यवस्थित पाठ योजना के रूप में सहायक हो। मुनिश्री प्रमाणसागरजी ने जैन धर्म दर्शन पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की है । इस ग्रंथ में जैनधर्मं दर्शन, इतिहास, आचार आदि विविध पक्षों पर प्रामाणिक सामग्री का समावेश किया गया है। इस ग्रंथ के अध्ययन की पूर्व तैयारी के रूप में भी, उपयोग हेतु मुनिश्री ने "जैन सिद्धान्त शिक्षण" शीर्षक से प्रस्तुत पुस्तक की रचना की है. इस पुस्तक में जैन दर्शन में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों और पदों को सूत्रात्मक शैली में समझाया गया है। प्रस्तुत पुस्तक के बीस अध्यायों के अपने सीमित पृष्ठों में यह पुस्तिका गागर में सागर के समान है. ..... ब्र. प्रदीप शास्त्री "पीयूष"
 
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जीवन उत्कर्ष का आधार

प्रत्येक मानव में यह भावना अवश्य होती है कि हम किसी ऐसे आदर्श को पा जायें, जिसके आश्रय से हमारे गुणों में विकास ही नहीं हो, अपितु वे सर्वोत्तम दशा को प्राप्त हो जायें। किन्तु उनकी सर्वोत्तम दशा को प्राप्त करने के लिए कृच्छसाधना की आवश्यकता होती है।यह कृच्छसाधना शारीरिक, मानसिक व चैतसिक स्टार पर करनी होती है। साधना की समष्टि पर ही मानव के महामानव रूप का रूपान्तरण प्रतिफलित होता है।

जैन धर्म इन्हीं विशेषताओं से समाहित मनुष्य को तीर्थंकर जैसे विशेषणों से सुशोभित करता है। ऐसा महामानव अपनी भलाई के स्थान पर जगत की भलाई की सोचता है, परिवार की सुख सुविधा की जगह लाओक मंगल व जन कल्याण की भावना करता है। वह मात्र सोचता ही नहीं है अपितु करने की भी भरसक कौशिश करता है।

तरुणाई के संवाहक, ओजस्वी प्रवक्ता मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने मानव को महामानव के रूपान्तरण की दिशा में प्रयोग में आने योग्य कतिपय विशेषताओं पर अपनी नज़र रखी है। इस प्रवचन संग्रह के पारायण से जन मंगल/ जन कल्याण की भावनाओं का विकास हो सकेगा। ..... डी राकेश जैन , सागर

 
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घर को कैसे स्वर्ग बनायें
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आलेख आभार - डॉ. नीलम जैन, गुड़गाँव
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