| Literature | प्रकाशित कृतियाँ |
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जैन तत्त्वविद्या
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Bhartiya Jnanpith |
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तीर्थंकर
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निर्ग्रन्थ फाउण्डेशन फोन - 0755 -2542346, 4275658 |
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धर्म जीवन का आधार
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दिव्य जीवन का द्वार
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ज्योतिर्मय जीवन
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अंतस की ऑंखें
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पाठ पड़े नवजीवन का छोटे-छोटे व्यसन धीरे-धीरे बहुत बड़ा रूप धारण कर लेतें हैं । प्रस्तुत पुस्तक में पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज के मुखार्विन्द से प्रवाहित प्रखर वाणी का संकलन है । मुनि श्री द्वारा जबलपुर महानगर में दस-दिवसीय-प्रवचनमाला में विभिन्न विषयों पर मंगल प्रवचन रूपी अमृतवर्षा हुई । जीवन की सार्थकता , दुखमुक्ति के उपाय, सुख का मूल संतोष, मन चंगा तो कठोती में गंगा, प्रसन्नता का राजमार्ग, धर्म और जीवन व्यवहार, घर-परिवार में नारी, सम्बन्ध पिता-पुत्र के, विलुप्त होते संस्कार और जीवन-मूल्य, धर्म और युवा आदि विषयों पर मुनि श्री की प्रवचन शैली श्रोताओं को सोचने पर विवश कर देती है।
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धर्म साधिये जीवन में जैन उपासना एवं साधना के मार्ग में निरन्तर विकास एवं स्थायित्व के लिए अनेक प्रकार की भावनाओं का विचार किया गया है । कभी व्रतों की सुरक्षा के लिए भावनाओं को भाने का परामर्श दिया, तो कभी व्यवहार की समीचीन प्रवृति के लिए भावनाओं का आश्रय लेने की बात कही । संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति - वैराग्य के लिए बारह भावनाओं का अबलम्बन लेने का निर्देश भी दिया गया । बारह भावनाओं का चिन्तवन किसी भी साधक के लिए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य होता है। आचार्यों की जनहितकारी वाणी में इन बारह भावनाओं की विस्तृत व्याख्याएँ - विवेचनाएँ प्रस्तुत हुई हैं । इन्हीं को सूत्र रूप से आश्रयीभूत करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने अपनी प्रखर शैली में प्रवचन देकर जनमानस को कृतार्थ किया है । प्रस्तुत कृति में बारह पाठों के माध्यम से जैनधर्म के अनेक गूढ़ सिद्धान्तों एवं रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।
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मर्म जीवन का |
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सुखी जीवन की राह |
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| Home | आभार - डॉ. नीलम जैन , गुड़गाँव | मुखपृष्ठ |